क्या पहाड़ इस बार अपनी पार्टी चुनेगा या फिर दिल्ली की राजनीति ही देवभूमि का भविष्य तय करेगी?
उत्तराखंड की राजनीति में पहाड़ फिर से हुंकार भर रहा है और सवाल सीधा है क्या ‘जय पहाड़, जय पहाड़ी’ का नारा इस बार सत्ता के दरवाज़े तक पहुंचेगा या फिर एक बार फिर राष्ट्रीय दलों की चुनावी मशीनरी पहाड़ की आवाज़ को दबा देगी? उत्तराखंड क्रांति दल यानी यूकेडी वही पार्टी जो उत्तराखंड राज्य आंदोलन की कोख से निकली वही पार्टी, जिसने जल, जंगल, जमीन पलायन, रोजगार और पहाड़ की पहचान को हमेशा अपना सबसे बड़ा मुद्दा बनाया। पिछले कुछ सालों में यूकेडी ने छोटे स्तर पर सही लेकिन अपने जनाधार को फिर से खड़ा करने की कोशिश की है। युवा जय पहाड़, जय पहाड़ी के नारों के साथ जुड़ते दिखाई दे रहे हैं लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सोशल मीडिया की ये गूंज वोटिंग मशीन तक पहुंचेगी?

क्योंकि उत्तराखंड की राजनीति की सबसे बड़ी सच्चाई है कि यहां की जनता कब किस मूड में फैसला कर दे इसका अंदाजा बड़े-बड़े रणनीतिकार भी नहीं लगा पाते। यूकेडी भले ही 2027 में 70 की 70 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा कर रही हो लेकिन असली चुनौती सिर्फ चुनाव लड़ना नहीं बल्कि हर बूथ तक पहुंच बनाना है और यहीं यूकेडी कमजोर नजर आती है। वित्तीय संसाधनों की कमी, सीमित प्रचार तंत्र और जमीनी स्तर पर मजबूत संगठन की कमी पार्टी के सामने बड़ी चुनौती है।
दूसरी तरफ भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां हैं जिनके पास पन्ना प्रमुख से लेकर बूथ स्तर तक मजबूत नेटवर्क मौजूद है। इसे बंगाल के उदाहरण के जरिय यूं समझा जा सकता है।तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में वर्षों तक अपनी जमीनी पकड़ मजबूत रखी लेकिन भाजपा ने 2019, 2021 और अब 2026 के चुनावों में पूरी ताकत झोंक दी।

प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्री, स्टार प्रचारक पूरा संगठन पूरा संसाधन सिर्फ एक राज्य जीतने के लिए मैदान में उतार दिया गया। यानी अब राजनीति सिर्फ विचारधारा की लड़ाई नहीं रही ये लड़ाई बन चुकी है स्थानीय पहचान बनाम राष्ट्रीय ताकत की और यही फॉर्मूला अब उत्तराखंड में भी दिख रहा है। यूकेडी कह रही है मूल निवास चाहिए, सशक्त भू-कानून चाहिए, गैरसैंण स्थायी राजधानी चाहिए, पलायन रोकना है,
200 यूनिट मुफ्त बिजली देनी है यानी उसके मुद्दे सीधे जनता से जुड़े हैं। लेकिन इतिहास दर्शाता है कि राज्य बनने के बाद 2002 में यूकेडी ने 3 विधानसभा सीटें जीती थीं लेकिन उसके बाद पार्टी लगातार कमजोर होती चली गई। 2024 लोकसभा चुनाव में भी पार्टी ने 5 में से 4 सीटों पर उम्मीदवार उतारे
गढ़वाल से आशुतोष नेगी, हरिद्वार से मोहन सिंह असवाल, नैनीताल-उधम सिंह नगर से शिव सिंह रावत औरअल्मोड़ा-पिथौरागढ़ से अर्जुन कुमार देव। टिहरी सीट पर निर्दलीय बॉबी पंवार को समर्थन दिया गया लेकिन नतीजे यूकेडी के पक्ष में नहीं गए। यहां तक कि चुनाव चिन्ह फ्रीज होने की वजह से पार्टी को और बड़ा झटका लगा। अब फरवरी 2026 में यूकेडी ने साफ कर दिया कि कोई गठबंधन नहीं होगा। जनवरी 2026 में केंद्रीय अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती ने ऐलान किया कि पार्टी 2027 में 70 की 70 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और नया नारा दिया एक बूथ, दस युवा।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है क्या ये नारा जमीनी हकीकत बन पाएगा? क्योंकि उत्तराखंड की जनता भाजपा और कांग्रेस दोनों से नाराज जरूर दिखाई देती है लेकिन क्या वो तीसरे विकल्प को सत्ता सौंपने का जोखिम उठाएगी? अगर बड़े दलों के साफ-सुथरे चेहरे यूकेडी में शामिल होते हैं, अगर पार्टी बूथ स्तर पर खुद को मजबूत कर लेती है, अगर स्थानीय नाराजगी को वोट में बदल पाती है तो 2027 उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा उलटफेर साबित हो सकता है और अगर ऐसा नहीं हुआ तो “जय पहाड़, जय पहाड़ी” सिर्फ नारा बनकर रह जाएगा। फिलहाल सवाल बड़ा है, क्या पहाड़ इस बार अपनी पार्टी चुनेगा या फिर दिल्ली की राजनीति ही देवभूमि का भविष्य तय करेगी?



























