सिलेंडर 993रुपए महंगा, लेकिन सत्ता को दिख रहा सिर्फ चुनावी एजेंडा
हल्द्वानी । वर्तमान में देश की जनता महंगाई से लड़ रही है, आम आदमी इस वक्त सिलेंडर, स्कूल फीस, अस्पताल के बिल और रोज़गार की चिंता में पिस रहा है। 1 मई को कामर्शियल गैस सिलेंडर का 993 रुपए महंगा होना सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस रसोई की चीख है जहां पहले ही महंगाई ने चूल्हे की आग धीमी कर दी है। लेकिन राजनीति की दिशा देखिए जनता शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और गरीबी पर जवाब चाहती है, जबकि सत्ता और विपक्ष अपने-अपने नैरेटिव की लड़ाई में उलझे हैं। कोई वन्देमातरम और पाकिस्तान पर बहस कर रहा है, तो कोई ई.वी.एम. और वोट चोरी पर। उधर मीडिया आम चूसकर खाना चाहिए या काटकर जैसी बहसों में टीआरपी तलाश रहा है।असली मुद्दे कहीं पीछे छूट चुके हैं।

राजनीति अब जनता पहले नहीं, बल्कि दल पहले के सिद्धांत पर चल रही है। उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में भी यही तस्वीर साफ दिखती है। मुख्यमंत्री हर छोटे उद्घाटन में हेलीकॉप्टर से पहुंचते हैं, सरकारी कार्यक्रमों में पार्टी की चमक दिखाई देती है और सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल राजनीतिक संदेश देने के लिए होता है। सवाल ये नहीं कि उद्घाटन कौन कर रहा है, सवाल ये है कि क्या जनता के टैक्स का पैसा जनता की प्राथमिकताओं पर खर्च हो रहा है या राजनीतिक ब्रांडिंग पर? जब सरकारों की प्राथमिकता संगठन और सत्ता बचाना बन जाए, तब पहाड़ के गांव खाली होने लगते हैं, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं मिलते और युवा रोजगार के लिए पलायन करने को मजबूर हो जाते हैं।
आज हालात ऐसे हैं कि यदि सत्ता के दरवाजे पर तीन लोग जाते हैं जिस में एक आम नागरिक, दूसरा सत्ता पक्ष का कार्यकर्ता और तीसरा विपक्ष का समर्थक, तो काम सिर्फ पार्टी कार्यकर्ता का होता है। आम आदमी फाइल लेकर चक्कर काटता रह जाता है। यही उस राजनीति की सच्चाई है जहां व्यक्ति की योग्यता और समस्या से ज्यादा उसकी राजनीतिक पहचान देखी जाती है।

सबसे बड़ा सवाल वोटर से भी है, जब जनता उम्मीदवार के चरित्र, ईमानदारी और काम के बजाय सिर्फ पार्टी के झंडे को देखकर वोट देती है, तो जीतने वाला नेता भी जनता नहीं, पार्टी का वफादार बन जाता है। टिकट पार्टी देती है, फंड पार्टी देती है, अगला चुनाव पार्टी लड़वाती है इसलिए जवाबदेही भी पार्टी के प्रति ज्यादा हो जाती है। आम आदमी पांच साल बाद सिर्फ वोट डालने के दिन याद आता है।
यही वजह है कि कई बार पक्ष और विपक्ष के बीच अंदरखाने की सेटिंग की चर्चा भी होती है, क्योंकि सिस्टम दोनों को सूट करता है। नुकसान सिर्फ उस नागरिक का होता है जो किसी राजनीतिक खेमे का हिस्सा नहीं है।

अब सवाल यही है, क्या बदलाव की शुरुआत स्थानीय स्तर पर साफ छवि वाले निर्दलीय उम्मीदवारों को चुनकर हो सकती है? या फिर राजनीति इतनी पार्टी-केंद्रित हो चुकी है कि जनता के मुद्दे अब सिर्फ भाषणों और घोषणापत्रों तक सीमित रह जाएंगे?



























