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जब अपने ही दामन झटक कर चल दिए,तो गैरो से क्या गिला

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सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर निजीकरण का कह


हल्द्वानी। इन दिनों प्रदेश मै संचालित हो रहे किसी न किसी कॉरपोरेट अस्पतालों के उद्घाटन में सत्ता के नामचीन चेहरों की मौजूदगी ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। हल्द्वानी में एक निजी हॉस्पिटल के उद्घाटन के दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, नैनीताल सांसद अजय भट्ट, महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल व पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी सहित भाजपा के कई बड़े नेता मौजूद थे, जिसने इस कार्यक्रम को भव्यता का रूप तो दिया। लेकिन यह भव्यता सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली की सच्चाई से मुँह नहीं मोड़ सकती। यहां बता दे कि
इसी उद्घाटन स्थल से महज कुछ कदमों की दूरी पर स्थित सरकारी डॉ. सुशीला तिवारी अस्पताल संकटों से जूझ रहा है। यहां की स्थिति यह है कि कर्मचारियों को समान कार्य के लिए समान वेतन की लड़ाई लड़नी पड़ रही है, अस्पताल में संसाधनों की भारी कमी के साथ साथ डॉक्टरों की भारी किल्लत है, और मरीजों की बढ़ती भीड़ ने अस्पताल की व्यवस्थाओं को पूरी तरह चरमरा कर रख दिया है । यह सरकारी अस्पताल जो न केवल उत्तराखंड बल्कि उत्तर प्रदेश के मरीजों को भी इलाज प्रदान करता था, अब अपनी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है। अब यह साफ दिखने लगा है कि सरकार सरकारी स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के बजाय निजीकरण को बढ़ावा दे रही है? यहां सवाल यह भी है कि क्या सरकारी अस्पतालों, स्कूलों और कॉलेजों को जानबूझकर कमजोर किया जा रहा है ताकि निजी संस्थानों को आगे बढ़ने का मौका मिले? मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के दौरे हमेशा निजी संस्थानों के उद्घाटन या निजी कार्यक्रमों में शिरकत करने तक सीमित रहते हैं, और इन आयोजनों का खर्च सरकारी खजाने से चलता है।यह विरोधाभास न सिर्फ सरकारी तंत्र पर सवाल उठाता है, बल्कि सरकार की प्राथमिकताओं पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। जनता से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या इस तरह की योजनाओं का सरकार के वास्तविक उद्देश्यों से कोई लेना-देना है, या फिर भ्रष्टाचार और निजीकरण के नाम पर एक साजिश रची जा रही है?कुल मिलाकर, सरकारी तंत्र में पाई जाने वाली यह अराजकता और भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें आज के दौर की सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी हैं।