मुख्यमंत्री को भेजा विस्तृत ज्ञापन, सीमांत क्षेत्रों के दौरे एवं जनता से संवाद की मांग

“लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा भारत का अभिन्न हिस्सा, सीमांत समाज राष्ट्रहित में हर बलिदान को तैयार”
देहरादून/पिथौरागढ़। नेपाल सरकार द्वारा हाल के वर्षों में समय-समय पर लिपुलेख, कालापानी एवं लिम्पियाधुरा क्षेत्र को लेकर दिए जा रहे आधिकारिक वक्तव्यों के विरोध में उत्तराखंड में सामाजिक संगठनों की सक्रियता बढ़ती दिखाई दे रही है। इसी क्रम में किसान मंच उत्तराखंड ने शुक्रवार को प्रदेश स्तर पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री उत्तराखंड सरकार को एक विस्तृत ज्ञापन प्रेषित किया। ज्ञापन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि लिपुलेख, कालापानी एवं लिम्पियाधुरा भारत और उत्तराखंड का अभिन्न हिस्सा हैं तथा सीमांत क्षेत्र का समाज किसी भी प्रकार के बाहरी दावे को कभी स्वीकार नहीं करेगा।
किसान मंच उत्तराखंड के प्रदेश अध्यक्ष एवं किसान मकान बचाओ संघर्ष समिति उत्तराखंड के संस्थापक किसान पुत्र कार्तिक उपाध्याय द्वारा भेजे गए ज्ञापन में कहा गया है कि सीमाओं से जुड़े विषय केवल नक्शों और भूगोल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह देश की संप्रभुता, सीमांत समाज की भावनाओं, पूर्वजों के बलिदान, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय अस्मिता का विषय है। ज्ञापन में कहा गया कि उत्तराखंड के सीमांत क्षेत्रों के लोगों ने सदैव राष्ट्र की रक्षा, सीमाओं की सुरक्षा और राष्ट्रीय एकता के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है तथा आज भी सीमांत समाज देशहित में पूरी मजबूती के साथ खड़ा है।
ज्ञापन में मुख्यमंत्री से आग्रह किया गया है कि वे शीघ्र सीमांत क्षेत्रों का दौरा कर वहां के स्थानीय नागरिकों, पूर्व सैनिकों, युवाओं, सामाजिक संगठनों एवं जनप्रतिनिधियों से संवाद स्थापित करें। किसान मंच का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियों में सीमांत क्षेत्रों में सरकार की प्रत्यक्ष उपस्थिति अत्यंत आवश्यक है, जिससे वहां के नागरिकों का मनोबल मजबूत होगा और यह संदेश जाएगा कि राज्य सरकार सीमांत समाज की भावनाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों को गंभीरता से ले रही है।
किसान पुत्र कार्तिक उपाध्याय ने कहा कि उत्तराखंड के सीमांत क्षेत्रों से बड़ी संख्या में युवा भारतीय सेना, अर्धसैनिक बलों एवं सुरक्षा एजेंसियों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। सीमांत समाज का प्रत्येक परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। ऐसे में सीमा संबंधी विषयों पर किसी भी प्रकार के विवादित बयान स्थानीय जनता की भावनाओं को प्रभावित करते हैं। उन्होंने कहा कि देश की सीमाएं केवल जमीन का टुकड़ा नहीं होतीं, बल्कि वे राष्ट्र की गरिमा, शौर्य और अस्मिता का प्रतीक होती हैं।
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि लिपुलेख, कालापानी एवं लिम्पियाधुरा क्षेत्र सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और इन क्षेत्रों का ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं प्रशासनिक संबंध भारत एवं उत्तराखंड से रहा है। किसान मंच ने कहा कि सीमांत समाज किसी भी परिस्थिति में देश की एकता और अखंडता के साथ खड़ा रहेगा तथा यदि आवश्यकता पड़ी तो राष्ट्रहित में हर प्रकार का सहयोग और बलिदान देने से पीछे नहीं हटेगा।
संगठन ने ज्ञापन में यह मांग भी उठाई कि सीमांत क्षेत्रों में आधारभूत सुविधाओं का तेजी से विस्तार किया जाए। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार, इंटरनेट, पेयजल एवं सुरक्षा व्यवस्थाओं को और अधिक मजबूत बनाकर सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों का विश्वास बढ़ाया जाए। किसान मंच का कहना है कि सीमांत क्षेत्रों का विकास केवल क्षेत्रीय विकास का विषय नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़ा हुआ मुद्दा है। सीमांत गांव मजबूत होंगे तो देश की सीमाएं भी मजबूत होंगी।
किसान मंच उत्तराखंड ने मुख्यमंत्री को भेजे गए ज्ञापन में यह भी कहा कि सीमांत क्षेत्रों से लगातार हो रहा पलायन राष्ट्रीय दृष्टि से चिंताजनक विषय है। सरकार को सीमांत क्षेत्रों में रोजगार, कृषि, पर्यटन एवं स्थानीय स्वरोजगार के अवसर बढ़ाने चाहिए ताकि सीमावर्ती गांव आबाद रहें और वहां की सामाजिक एवं सामरिक स्थिति मजबूत बनी रहे।
किसान पुत्र कार्तिक उपाध्याय ने बताया कि यह ज्ञापन सोशल मीडिया, ईमेल, मीडिया माध्यमों एवं भारतीय डाक सेवा के जरिए मुख्यमंत्री कार्यालय को प्रेषित किया गया है ताकि इस विषय पर शीघ्र संज्ञान लेते हुए प्रभावी कार्रवाई की जा सके। उन्होंने कहा कि किसान मंच उत्तराखंड भविष्य में भी राष्ट्रहित, सीमांत समाज एवं उत्तराखंड की अस्मिता से जुड़े मुद्दों को मजबूती से उठाता रहेगा।
राजनीतिक एवं सामाजिक जानकारों का मानना है कि नेपाल द्वारा समय-समय पर सीमा संबंधी विषयों को लेकर दिए जाने वाले बयानों के बाद उत्तराखंड के सीमांत क्षेत्रों में जनभावनाएं लगातार मुखर हो रही हैं। ऐसे में राज्य सरकार के लिए सीमांत क्षेत्रों में विश्वास, संवाद और विकास को प्राथमिकता देना आवश्यक माना जा रहा है।



























