आस्था के दरबार में प्राथमिकता किसकी?

उत्तराखंड की पहाड़ियों से इस वक्त सिर्फ हर-हर महादेव की गूंज नहीं आ रही बल्कि कुछ सवाल भी उठ रहे हैं।
पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत ने केदारनाथ मंदिर यात्रा को लेकर राज्य सरकार और खासकर मुख्यमंत्री पर निशाना साधा है। उनका कहना है कि जब आम श्रद्धालु लंबी कतारों में खड़े हों, व्यवस्थाओं से जूझ रहे हों तब मुख्यमंत्री का कपाट खुलने के पहले दिन दर्शन के लिए जाना क्या यह पद की मर्यादा के अनुरूप है, या सत्ता के विशेषाधिकार का प्रदर्शन? उन्होंने साफ कहा मुख्यमंत्री का काम व्यवस्था बनाना है, न कि उन्हीं व्यवस्थाओं का पहला लाभ उठाना। इतना ही नहीं, हरक सिंह रावत ने अतीत की एक भयावह याद भी ताजा कर दी। उन्होंने विजय बहुगुणा का जिक्र करते हुए कहा कि जब वे भी कपाट खुलने के पहले दिन दर्शन के लिए पहुंचे थे उसके कुछ ही दिनों बाद 16-17 जून 2013 को केदारनाथ में भीषण आपदा आई थी एक ऐसी त्रासदी, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था। अब सवाल ये है क्या इतिहास की याद दिलाना सिर्फ राजनीतिक बयान है, या प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गंभीर टिप्पणी? इस बीच, कपाट खुलने के दिन ही एक श्रद्धालु की हार्ट अटैक से मौत की खबर ने व्यवस्थाओं पर और सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या मेडिकल इंतजाम पर्याप्त थे? क्या भीड़ प्रबंधन सही था? या फिर सिस्टम का फोकस कहीं और था? जब मुख्यमंत्री स्वयं दर्शन के लिए पहुंचते हैं, तो क्या पूरा प्रशासनिक तंत्र आम जनता से पहले वीआईपी मूवमेंट में लग जाता है? और अगर हां तो फिर जनता के लिए व्यवस्था का दावा कितना सच रह जाता है? केदारनाथ सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं बल्कि प्रशासनिक जिम्मेदारी की भी परीक्षा है।और इस परीक्षा में सवाल वही है क्या सरकार श्रद्धालुओं की सेवा में है, या सत्ता की सुविधा में?



























