Home ललिता कापड़ी रिश्तों का सम्मान — प्रेम की सच्ची मर्यादा

रिश्तों का सम्मान — प्रेम की सच्ची मर्यादा

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“रिश्तों का सम्मान शब्दों से नहीं, व्यवहार की छोटी-छोटी मर्यादाओं से प्रकट होता है।”

हल्द्वानी । आज के समय में प्रेम और विवाह को लेकर समाज में एक खुलापन दिखाई देता है। लोग अपने रिश्तों को स्वीकार करते हैं, अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं और अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेते हैं। यह परिवर्तन सकारात्मक भी है, क्योंकि इससे व्यक्तित्व की स्वतंत्रता को बल मिलता है। परंतु इसके साथ एक प्रश्न उतना ही महत्वपूर्ण है—क्या हम अपने रिश्तों को वह सम्मान दे पा रहे हैं, जिसके वे वास्तव में अधिकारी हैं?
चाहे महिला हो या पुरुष, चाहे रिश्ता प्रेम का हो या विवाह का—यदि किसी व्यक्ति को यह समझ ही नहीं है कि समाज, परिवार और अपने भीतर उस रिश्ते को किस प्रकार सम्मान दिया जाना चाहिए, तो केवल प्रेम करना या विवाह कर लेना पर्याप्त नहीं है। रिश्ता केवल साथ चलने का नाम नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी जिम्मेदारी है जिसमें दोनों व्यक्तियों को एक-दूसरे की भावनाओं, गरिमा और सामाजिक मर्यादा का ध्यान रखना पड़ता है। यदि हम ऐसा नहीं कर सकते तो हमें एकाकी जीवन जीना चाहिए।
आज एक विचित्र स्थिति देखने को मिलती है। कई बार जब कोई व्यक्ति सामाजिक मंच पर या सार्वजनिक स्थानों पर उपस्थित होता है तो यह स्पष्ट ही नहीं होता कि उसके जीवन में उसका साथी कौन है। यह स्थिति केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि उस रिश्ते की गरिमा पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। जीवन में मित्र भी होते हैं, सहकर्मी भी और रिश्तेदार भी—परंतु प्रत्येक संबंध की अपनी एक मर्यादा होती है। यदि इन सीमाओं का ध्यान नहीं रखा जाए तो अनजाने में हम अपने सबसे महत्वपूर्ण रिश्ते को ही आहत कर देते हैं।
अक्सर यह कहा जाता है—“हम बोल्ड हैं, हमें किसी से डर नहीं लगता” या “मेरा पार्टनर मुझे पूरी तरह समझता है।” परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपने व्यवहार से अनजाने में अपने साथी की भावनाओं को चोट पहुँचाएँ। आधुनिकता का अर्थ केवल स्वतंत्रता नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और जिम्मेदारी भी है। जरूरत से ज्यादा खुलापन कभी-कभी संबंधों की गरिमा को कम कर देता है। यह केवल पहनावे की बात नहीं है, बल्कि व्यक्तित्व और व्यवहार की भी बात है।
उदाहरण के लिए, कई सामाजिक कार्यक्रमों में देखा जाता है कि पति-पत्नी या प्रेमी-युगल साथ तो उपस्थित होते हैं, लेकिन बातचीत और व्यवहार में ऐसा लगता है मानो दोनों के बीच कोई विशेष संबंध ही न हो। सार्वजनिक मंच पर अपने साथी को सम्मानपूर्वक परिचित कराना भी रिश्ते की गरिमा का हिस्सा है। इसी प्रकार मित्रता भी जीवन का एक सुंदर पक्ष है, परंतु यदि मित्रता इस सीमा तक पहुँच जाए कि जीवनसाथी को असहजता महसूस होने लगे, तो यह सोचने की आवश्यकता है कि कहीं हम अपने महत्वपूर्ण रिश्ते की उपेक्षा तो नहीं कर रहे।
आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया भी रिश्तों के व्यवहार को प्रभावित करता है। कई लोग अपने मित्रों और परिचितों को तो महत्व देते हैं, परंतु अपने साथी को सार्वजनिक रूप से सम्मान देना भूल जाते हैं। यह छोटी-सी बात भी रिश्तों में दूरी का कारण बन सकती है।
सच तो यह है कि हम कहानियों, कविताओं और पुस्तकों में रिश्तों की बड़ी-बड़ी बातें लिखते हैं। प्रेम, आदर्श और संवेदनाओं की चर्चा करते हैं। परंतु इन सब से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि हमारे व्यवहार में उन मूल्यों की झलक कितनी दिखाई देती है। यदि हमारे शब्द और व्यवहार एक-दूसरे से मेल नहीं खाते, तो प्रेम केवल शब्दों तक ही सीमित रह जाता है।

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“जो व्यक्ति दुनिया के सामने अपने साथी को सम्मान नहीं दे पाता, वह प्रेम की गहराई को समझ ही नहीं पाया।”
यही वह समझ है जो किसी भी रिश्ते को मजबूत बनाती है। प्रेम का वास्तविक अर्थ केवल साथ होना नहीं, बल्कि साथ वाले व्यक्ति की गरिमा को भी उतना ही महत्व देना है। जब हम ‘मैं’ से आगे बढ़कर ‘हम’ को जीना सीख लेते हैं, तभी रिश्ते सच में सार्थक बनते हैं।