पहाड़ की डोली और मंत्रियों की मलाई
उत्तराखंड के पहाड़ों में आज नियति का जो क्रूर खेल चल रहा है उसे देखकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की रूह कांप सकती है। एक तरफ हमारे दूरस्थ गांवों की वो तस्वीरें हैं जो सीधे कलेजे पर वार करती हैं जहां स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर सिर्फ सन्नाटा पसरा है और बीमार बुजुर्गों या प्रसव पीड़ा से तड़पती महिलाओं को आज भी मजबूरी में डोली में लादकर मीलों पैदल मुख्य सड़क तक लाना पड़ता है। विडंबना देखिए कि जिन रास्तों पर एंबुलेंस होनी चाहिए थी वहां वन्यजीवों की ऐसी भयानक दहशत है कि इंसान अपनी ही देहरी पर सुरक्षित महसूस नहीं करता। तेंदुए, जंगली सूअर और बंदरों के बढ़ते संघर्ष ने पहाड़ के जनजीवन को एक ऐसे दोराहे पर खड़ा कर दिया है जहां खेती पूरी तरह तबाह हो चुकी है और शाम ढलते ही सन्नाटा किसी अनहोनी की आहट जैसा लगने लगता है। पहाड़ का जीवन आज भी कठिन संघर्षों की आग में तप रहा है जहां बुनियादी सुविधाओं के लिए बजट का रोना रोना एक सरकारी परंपरा बन चुकी है। लेकिन इसी बदहाली और अंधेरे के बीच देहरादून के सत्ता गलियारों से एक ऐसा फरमान निकला है जो पहाड़ की इस गरीबी और रोजमर्रा के संघर्ष का सरेआम मज़ाक उड़ाता है। सरकार ने एक ही झटके में मंत्रियों के यात्रा भत्ते में पूरे 30 हजार रुपए की भारी भरकम बढ़ोतरी कर दी है। अब हमारे माननीय मंत्री हर महीने 90 हजार रुपए की शाही रकम सिर्फ घूमने फिरने के नाम पर खर्च करेंगे। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि जिस राज्य में एक आम पहाड़ी परिवार महीने भर की हाड़ तोड़ मेहनत के बाद भी 10-15 हजार रुपए नहीं कमा पाता वहां मंत्रियों को एक्स्ट्रा खर्च के तौर पर 30 हजार रुपए की सौगात दी जा रही है। उत्तर प्रदेश की 1997 की पुरानी नियमावली को बदलकर रातों रात नियमावली 2026 तो बना दी गई ताकि नेताओं की सुख सुविधाओं में कोई आंच न आए पर काश! इतनी ही तेजी पहाड़ के गांवों में एंबुलेंस पहुंचाने या वन्यजीवों से सुरक्षा की कोई पुख्ता नीति बनाने में दिखाई होती। आज सवाल पूछना लाजमी है कि जब मंत्री 90 हजार रुपए के सरकारी तेल वाली चमचमाती लग्जरी गाड़ियों में बैठकर इन ऊंचे पहाड़ों से गुजरेंगे तो क्या उन्हें सड़क किनारे डोली के इंतजार में खड़ा वो बेबस और बीमार पहाड़ी नजर आएगा? क्या मंत्रियों की जेबों में जा रही यह अतिरिक्त राशि उन गांवों का अंधेरा और खौफ दूर कर पाएगी जहां ऊर्जा निगम बजट का बहाना बनाकर पीक ऑवर में रोस्टिंग कर रहा है? हकीकत तो यही है कि जनता आज भी डोली और डंडे के भरोसे वन्यजीवों से अपनी जान बचाने को मजबूर है और हुक्मरान नियमों की बाजीगरी करके अपनी सुख सुविधाओं का महल खड़ा कर रहे हैं। 30 हजार रुपए की यह बढ़ोतरी सिर्फ एक सरकारी आंकड़ा नहीं है बल्कि पहाड़ की उन उम्मीदों पर करारा तमाचा है जो आज भी एक सुरक्षित जीवन और बेहतर अस्पताल का सपना देख रही हैं।























