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विदा हुई रे शुभ होली तू

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ललिता कापड़ी

विदा हुई रे शुभ होली! तू, आशीष सभी को दे जाना,
जो सूने रह गए मन के आँगन, उनमें आश जगा जाना।

मिलन रह गया अगर कहीं, पथ भी सूने रह गए होंगे,
उन बिछड़े हृदयों में फिर से, रंग-प्रेम का सजा जाना।

रूठे रिश्तों की देहरी पर धूल अगर जम सी बैठी,
फागुन बनकर कोमल-कोमल स्नेह-दीप जला जाना।

कुछ आँखों में स्वप्न अधूरे, कुछ होठों पर मौन पड़ा,
उनके भीतर छिपी व्यथा को हँसकर गले लगा जाना।

जो ऊँच-नीच की दीवारें अब भी मन में उठती हैं,
उन पर मानवता का सुंदर इंद्रधनुष बना जाना।

जो जाति-धर्म के नामों पर बँटते रहते घर-आँगन,
उनके बीच प्रेम का सच्चा सेतु एक बना जाना।

बरसाने की राहों में यदि राधा अब भी तन्हा हो,
श्याम को उसके प्रेम का सच्चा अर्थ बता जाना।

अयोध्या के आँगन में फिर ऐसा पावन सवेरा हो,
फिर कोई वनवास न आए, ऐसा सुमंगल रचा जाना।

जो प्रेम-अगन धीमी पड़ती इस जग के व्यवहारों से,
अपने चटकीले रंगों से उसको पुनः स्फूर्ति दे जाना।

व्याकुल मन की विनती सुन ले,अगली फागुन-रातों में,
प्रेम-मिलन का आशीष लिए फिर से धरा पे आ जाना।