सुविधाओं के अभाव में पहाड़ चढ़ने से डर रहे सरकारी मातहत
शिक्षा-स्वास्थ्य चौपट, रोजगार सिमटा, फिर भी पहाड़ के नाम पर भर्ती हो रहे अफसर मैदान में जमा रहे अड्डा
उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में तैनाती से कतराने वाले पुलिसकर्मियों का मामला सामने आने के बाद अब पूरे सिस्टम की पोल खुल रही है। खाकी ही नहीं, हर विभाग का यही हाल है। पीडब्ल्यूडी, जल संस्थान, विद्युत, स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग तक में अधिकारी-कर्मचारी पहाड़ चढ़ने से बच रहे हैं।
सरकार ने भले ही सुगम-दुर्गम और गृह जनपद तैनाती जैसी नीतियां बनाईं, लेकिन जमीन पर इनका असर उल्टा दिख रहा है। अधिकारी तो गृह जिले में तैनात हो गया, पर उसके परिजन पहाड़ नहीं चढ़े। कारण एक ही है – पहाड़ में न ढंग के स्कूल हैं, न अस्पताल।
पहाड़ के सैकड़ों सरकारी स्कूल शिक्षक विहीन हैं। जिनमें हैं भी, वहां पढ़ाई के नाम पर खानापूर्ति। अफसर का बच्चा देहरादून-हल्द्वानी के प्राइवेट स्कूल में पढ़ेगा, तो वह पहाड़ में ड्यूटी क्यों करेगा। जिला अस्पतालों में डॉक्टर नहीं, सीएचसी-पीएचसी में दवा नहीं। गंभीर हालत में मरीज को 200 किमी मैदान लाना मजबूरी है। ऐसे में कौन अधिकारी अपने परिवार को पहाड़ में रखेगा। पहाड़ में रोजगार के संसाधन पहले ही सीमित थे, अब बचे-खुचे सरकारी संस्थान भी निजी हाथों में दिए जा रहे हैं। युवाओं का पलायन रुक नहीं रहा।
सरकार ने आमजन को बुनियादी सुविधा देने के बजाय नियम-कायदों का जाल बिछा दिया। सुगम-दुर्गम नीति का हश्र देखिए, दुर्गम में तैनात 22 दरोगा-जवान रसूख के दम पर सालों से मैदान में अटैच हैं। वेतन बागेश्वर-पिथौरागढ़ के कोटे से, ड्यूटी हल्द्वानी-नैनीताल में। एसटीएफ में अटैच दरोगा की दो साल की संबद्धता कब की खत्म, पर वेतन अब भी पहाड़ी जिले से उठ रहा है। 2025 में ट्रांसफर हुई महिला दरोगा ने आज तक थाने में आमद ही नहीं कराई। सेटिंग से वापस मैदान में चिपक गया। आईजी कुमाऊं निवेदिता कुकरेती ने अब ऐसे सभी पुलिसकर्मियों को मूल तैनाती पर भेजने के आदेश दिए हैं। पर सवाल बड़ा है सिर्फ पुलिस क्यों? जब तक पहाड़ में स्कूल-अस्पताल-सड़क नहीं सुधरेंगे, तब तक हर विभाग का कर्मचारी मैदान की तरफ भागेगा। सरकार को नीति नहीं, नीयत दिखानी होगी। वेतन पहाड़ का और आराम मैदान का, यह दोहरा चरित्र पहाड़ को और खोखला कर रहा है।

























