हल्द्वानी । लोकतंत्र में विधानसभा वह जगह होती है जहाँ जनता के सवाल उठते हैं, सरकार से जवाब मांगे जाते हैं और जनहित के मुद्दों पर बहस होती है। उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण में आयोजित विधानसभा सत्र के दौरान विपक्षी दल कांग्रेस के विधायकों ने कई अहम मुद्दे उठाए। लेकिन सत्र के बाद जिस तरह का राजनीतिक उत्सव देखने को मिला, उसने एक अलग ही सवाल खड़ा कर दिया—क्या सदन में मुद्दे उठाना ही उपलब्धि है या उन पर जमीन पर काम करना भी उतना ही जरूरी है? गैरसैंण में आयोजित विधानसभा सत्र के दौरान कांग्रेस विधायक सुमित हृदयेश (हल्द्वानी) और भुवन कापड़ी (खटीमा) ने प्रदेश से जुड़े कई गंभीर मुद्दों जिन में प्रदेश में बढ़ते अपराध, आम जनता में बढ़ती असुरक्षा की भावना, सिडकुल उद्योगों में स्थानीय युवाओं के लिए 70 प्रतिशत रोजगार आरक्षण की मांग आदि शामिल थी। सदन में इन मुद्दों को जिस बेबाकी और तार्किक ढंग से उठाया , वह विपक्ष की भूमिका को रेखांकित करता है। लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व ही यही होता है कि वह सरकार को जनता के सवालों से घेरता रहे और नीतिगत सुधार की मांग करे। लेकिन सदन की कार्यवाही समाप्त होने के बाद जो दृश्य सामने आया उन्होंने राजनीतिक विमर्श को दूसरी दिशा में मोड़ दिया। हल्द्वानी में कांग्रेस कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों ने विधायक सुमित हृदयेश का जिस गर्मजोशी से स्वागत किया, वह किसी चुनावी जीत के जश्न जैसा दिखाई दिया। स्वागत के दौरान फोटो, वीडियो और अभिनंदन का माहौल कुछ ऐसा था मानो विधायक अभी-अभी चुनाव जीतकर लौटे हों।
कुछ इसी तरह का नज़ारा खटीमा में भी देखने को मिला। यहाँ भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने विधायक भुवन कापड़ी का जोरदार स्वागत किया। कुल मिलकर स्वागत समारोह और उत्सव का यह माहौल राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर रहा था।राजनीतिक के जानकारों का इस संबंध में मानना है कि यह स्वागत केवल औपचारिकता नहीं बल्कि आने वाले राजनीतिक समीकरणों का संकेत भी हो सकता है। दरअसल, उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव धीरे-धीरे राजनीतिक दलों के एजेंडे में आने लगे हैं। ऐसे में नेताओं की सक्रियता, कार्यकर्ताओं की लामबंदी और सार्वजनिक कार्यक्रमों का बढ़ना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।

लेकिन लोकतंत्र में एक बुनियादी सवाल हमेशा बचा रहता है।सदन में मुद्दे उठाना एक जिम्मेदारी है और यह जनप्रतिनिधि का नैतिक कर्तव्य भी है। लेकिन परख की असली कसौटी यह होती है कि उन मुद्दों को जमीन पर कितनी गंभीरता से उठाया गया और जनता की समस्याओं के समाधान के लिए क्या ठोस प्रयास किए गए। राजनीति में तालियों की गूंज और स्वागत के मंच अक्सर दिखाई देते हैं, लेकिन जनता की उम्मीदें उससे कहीं बड़ी होती हैं। आख़िर में फिर सवाल वही उठ खड़ा होता है कि क्या विधानसभा में उठे मुद्दे आने वाले समय में नीति और निर्णयों में बदलेंगे या फिर राजनीति में स्वागत और संदेश का सिलसिला ही चर्चा का केंद्र बना रहेगा?























