नेहा खत्री, जयपुर
सूर्यास्त का समय था। आकाश सुनहरी आभा से नहाया हुआ था। चारों ओर फैली प्रकृति अपनी अद्भुत छटा बिखेर रही थी।पेड़ों पर बैठे पक्षी मधुर स्वर में कलरव कर रहे थे, और ठंडी-ठंडी हवा मन को असीम शांति का अनुभव करा रही थी। मैं बगीचे में एक पेड़ के नीचे बैठी इस मनमोहक दृश्य का आनंद ले रही थी।रंग-बिरंगे फूलों की महक वातावरण में घुलकर एक अदृश्य संगीत रच रही थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो प्रकृति स्वयं अपने सौंदर्य का उत्सव मना रही हो। तभी मेरी नजर पास की झाड़ियों में हल्की-सी हलचल पर पड़ी। जिज्ञासावश मैं उठकर उस ओर बढ़ी। वहाँ एक नन्हा-सा पक्षी घायल अवस्था में पड़ा था, जिसके पंख मानो उड़ने की शक्ति खो चुके थे। उसकी दशा देखकर मेरा हृदय करुणा से भर उठा। मैंने उसे सावधानीपूर्वक उठाया और पास ही बैठकर उसकी देखभाल करने लगी। पानी की कुछ बूंदें उसके मुख में डालीं और उसे सुरक्षित स्थान पर रखा। कुछ समय बाद उसने धीरे-धीरे अपने पंख फड़फड़ाए।उसकी आँखों में जीवन की चमक लौटती देख मेरे मन में एक अनोखी खुशी जाग उठी। अचानक उसने उड़ने का प्रयास किया और कुछ ही क्षणों में वह खुले आकाश में स्वतंत्र होकर उड़ गया।
मैं देर तक उसे निहारती रही। उस क्षण मुझे यह अनुभूति हुई कि
सच्ची खुशी दूसरों के जीवन में आशा और सहारा बनने में ही निहित है। संध्या अब ढल चुकी थी, पर मेरे मन में एक नई रोशनी जगमगा रही थी। मैं मुस्कुराते हुए घर की ओर बढ़ी, और प्रकृति के उस अनमोल स्पर्श को अपने हृदय में सदा के लिए संजो लिया।



























