Home नेहा खत्री, जयपुर “अधूरी चिट्ठी”

“अधूरी चिट्ठी”

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नेहा खत्री, जयपुर

श्वेता का पुराना घर आज भी बिल्कुल वैसा ही था बिल्कुल शांत किन्तु अब कोई नहीं रहने से जर्जर अवस्था में था। उसकी खामोशी ऐसी थी जैसे कई वर्षों से किसी के आने की प्रतीक्षा कर रहा हो…।
श्वेता ने धीरे से दरवाजा खोला तो धूल की परतें हवा में तैरने लगी। मकड़ियों के जाले भी रास्ता रोके खड़े थे। जो इस बात से परेशान थे कि यह कौन आया है। यहां की प्रत्येक चीज में बीते हुए वक्त की यादें थी और कुछ अनकही बातों की सौगातें। हर दीवार कुछ बोल रही थी।

श्वेता इस पुराने घर में आना तो नहीं चाहती थी पर उसका एक सामान था जो यहां छूट गया था। वहीं लेने आई थी। लेकिन जैसे ही उसने इस घर में कदम रखा उसे लगा कि यह घर उसे थामने की कोशिश कर रहा है कुछ दिखाने और समझाने के लिए। कुछ ऐसा था जो उसका यहां इंतजार कर रहा था। कमरे के कोने में एक अलमारी पर उसकी नजर गई। उसमें उसका कुछ सामान अभी भी पड़ा था। जैसे ही श्वेता ने उस अलमारी को खोला एक हल्की सी चरमराहट हुई…. जैसे कोई लंबे अर्से बाद अपनी बात कहने को उतारू हो, उसी अलमारी में कुछ पुराने कपड़ो का ढेर था जिस पर धूल की एक परत जमी थी। इनके बीच एक डायरी रखी थी । जिसने श्वेता को पुराने समय में खींच लिया। श्वेता ने उस डायरी को अपने हाथों में पकड़ा और उसका दिल जोरों से धड़क रहा था। वह सालों पहले जाते समय इसे यही छोड़ गई थी आज जब सामने आई तो लगा किसी ने हाथों को थाम लिया है।और वह घबराहट के साथ उसके पन्ने पलटने लगी। उसके आखिर में एक मुड़ा कागज था। उसने उसे खोला जिसमें लिखा था….
“मैं कभी तुम्हे मिलकर यह कभी नहीं कह पाता इसलिए जो मैं तुमसे कहना चाहता हूं वो लिख रहा हूं।”
श्वेता की आँखों में हर शब्द के साथ आंखों में नमी उतर आई।
कमरे में सन्नाटा और गहरा हो गया… जैसे हर दीवार उस प्रेम कहानी को जानती हो।
वो आगे आखिरी हिस्सा पढ़ने लगी
“और अगर कभी तुम वापस लौट आओ… तो”
बस यहीं… चिट्ठी खत्म हो गई।
अधूरी।
श्वेता कुछ देर तक वहीं खड़ी रही।
उसका दिल जैसे किसी अनजाने दर्द से भर गया था—एक ऐसा दर्द, जिसे वह कई सालों से दिल में दबाए बैठी थी।
“तो… क्या?” उसने खुद से फुसफुसाया।
तभी खिड़की से एक ठंडी हवा का झोंका आया और चिट्ठी उसके हाथों से हल्की-सी फड़फड़ाई। उसे ऐसा लगा जैसे कोई उसके पास खड़ा हो… बहुत करीब… जैसे कोई जवाब पाना चाहता हो। उसने धीरे से मुड़कर देखा, कमरे में नजर दौड़ाई।कुछ ढूंढ रही थी, दिल में एक अजीब-सी हलचल थी। श्वेता ने चिट्ठी को सीने से लगा लिया। फिर उसने पास मेज के ड्रॉर को खोला उसमें एक पुरानी पेंसिल मिल गई। कुछ पल बाद, उसने उसी अधूरी लाइन के नीचे लिखना शुरू किया,
“तो कभी ना जाना। हमेशा के लिए एक हो जाना। उसे अब एक जवाब मिल गया था। उसने मोबाइल पर एक नंबर डायल किया और बस इतना बोला “मैं लौटना चाहती हूं। ” फोन कट कर दिया। अधूरी चिट्ठी को पूरा करने का समय आ गया था। उसकी आँखों से एक आंसू गिरा, लेकिन इस बार उसमें दर्द कम था… और सुकून ज्यादा।