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अपनी कहानी खुद लिखो

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ललिता कापड़ी

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हल्द्वानी। महिला दिवस केवल उत्सव का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी है। यह वह समय है जब हम समाज में स्त्री की भूमिका, उसकी चुनौतियों और उसकी संभावनाओं पर गंभीरता से विचार करते हैं। आज की स्त्री शिक्षा, विज्ञान, साहित्य, राजनीति और सामाजिक कार्यों के क्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ रही है, परंतु इसके बावजूद जीवन की छोटी-छोटी उलझनों में वह कई बार अपने ही आत्मविश्वास को भीतर कहीं दबा देती है।
परिवार, संबंधों और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच वह अक्सर स्वयं को अंतिम स्थान पर रख देती है। अवसर उसके सामने आते हैं, पर असमंजस, संकोच और परिस्थितियों की जटिलता उसे ठहरने पर मजबूर कर देती है। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि स्त्री अपने अस्तित्व को कैसे पहचान पाए?
जैसा कि कहा गया है—
“स्वतंत्रता का पहला कदम बाहर नहीं, मन के भीतर उठता है।”
वास्तविक परिवर्तन भी यहीं से शुरू होता है। जब स्त्री अपने भीतर के डर, संकोच और असमंजस को पहचानकर उनसे आगे बढ़ने का निर्णय लेती है, तभी वह अपनी कहानी की सच्ची लेखिका बनती है।
दरअसल, जीवन हमें अवसर देता है, लेकिन उन अवसरों को पहचानने और सही दिशा देने का साहस हमें स्वयं ही जुटाना होता है। इसी संदर्भ में यह बात बहुत सार्थक लगती है—
“जो स्त्री अपने निर्णय स्वयं लेने लगती है, वही अपने भाग्य की लेखिका बन जाती है।”
स्त्री की वास्तविक स्वतंत्रता उसी दिन होगी, जब वह मानसिक और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनेगी। आर्थिक आत्मनिर्भरता उसे निर्णय लेने का आत्मविश्वास देती है और मानसिक स्वतंत्रता उसे सही-गलत का विवेक प्रदान करती है।
परंतु यह भी उतना ही आवश्यक है कि स्वतंत्रता का अर्थ केवल प्रतिस्पर्धा या अनुकरण न बन जाए। यदि इतिहास में पुरुषों ने कुछ गलतियां की हैं, तो उन्हें दोहराना स्त्री की स्वतंत्रता नहीं हो सकती। सच्ची स्वतंत्रता वह है जो विवेक, मर्यादा और संतुलन के साथ आगे बढ़े।
आज सोशल मीडिया के दौर में अभिव्यक्ति के अनेक मंच उपलब्ध हैं। महिलाएँ पहले से कहीं अधिक सक्रिय होकर अपनी प्रतिभा और विचारों को सामने ला रही हैं। यह परिवर्तन सकारात्मक है और प्रेरणादायक भी। परंतु इस अभिव्यक्ति के साथ यह समझना भी आवश्यक है कि हमारा प्रदर्शन समाज और आने वाली पीढ़ी को क्या दिशा दे रहा है।
दरअसल, यह प्रश्न केवल स्त्री का नहीं है, पुरुष का भी है। समाज का संतुलन तभी संभव है जब दोनों अपनी जिम्मेदारियों को समझें। प्रकृति का एक शाश्वत सत्य है कि स्त्री और पुरुष प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।
इसी संदर्भ में एक बात बहुत महत्वपूर्ण है—
“प्रतिस्पर्धा से समाज नहीं बनता, पूरकता से सृष्टि आगे बढ़ती है।”
न कोई छोटा है, न कोई बड़ा। यदि कुछ बड़ा है तो केवल अहम। और जब इस अहम से ‘अ’ हट जाता है, तो वह ‘हम’ बन जाता है। यही हम परिवार को जोड़ता है, समाज को बनाता है और सृष्टि को सुंदर बनाता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि स्त्री और पुरुष दोनों यह समझें कि वे एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सहयोगी हैं। जब दोनों मिलकर आगे बढ़ते हैं, तब ही एक संतुलित और संवेदनशील समाज का निर्माण संभव होता है।
इस महिला दिवस पर यही संदेश है—
स्त्री को किसी और की कलम का इंतज़ार करने की आवश्यकता नहीं है।
वह अपनी कहानी स्वयं लिख सकती है—साहस से, विवेक से और आत्मविश्वास के साथ।
क्योंकि जब स्त्री अपनी कहानी खुद लिखती है, तब केवल उसका जीवन ही नहीं बदलता, बल्कि समाज की दिशा भी उज्ज्वल हो जाती है।