कब जागेगा समाज और प्रशासन?
ललिता कापड़ी, हल्द्वानी
एक नाबालिग बेटी के साथ हुई दरिंदगी केवल एक अपराध नहीं, बल्कि पूरे समाज की आत्मा पर लगा हुआ कलंक है। एक तरफ़ मंचों पर महिलाओं को सम्मानित किया जाता है, बेटियों की सुरक्षा के भाषण दिए जाते हैं, और दूसरी तरफ़ बेटियों की अस्मिता को रौंदने वाले दरिंदे खुलेआम घूमते हैं। फिर उस पर भी राजनीति होती है। कैसी व्यवस्था है यह? कैसा समाज बनता जा रहा है हमारा? कैसे सफ़ेद कपड़ों में राक्षस हमारे बीच घूम रहे हैं? जो लोग किसी मासूम बेटी की ज़िंदगी बर्बाद करते हैं, वे इंसान कहलाने के योग्य नहीं हैं। ऐसे लोगों के लिए समाज के भीतर जो गुस्सा और घृणा है, वह स्वाभाविक है। लोगों के भीतर यह आक्रोश इसलिए फूट रहा है क्योंकि हर बार बेटियों की चीख़ों से ज्यादा शोर राजनीति का सुनाई देता है।
चंपावत की यह घटना पूरे प्रदेश के माथे पर शर्म का दाग है।
हर माँ डरी हुई है, हर बहन असुरक्षित महसूस कर रही है, हर पिता भीतर से टूटा हुआ है। अब समय आ गया है कि केवल नारेबाज़ी नहीं, कठोर और त्वरित न्याय दिखाई दे। ऐसा न्याय, जिसे देखकर कोई भी दरिंदा किसी बेटी की तरफ़ नज़र उठाने से पहले काँप जाए। समाज को भी तय करना होगा कि बेटियों के अपराधियों को किसी मंच, किसी राजनीति, किसी संरक्षण और किसी सम्मान में जगह नहीं मिलेगी। उनका सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए। उनके समर्थन में खड़े होने वालों को भी समाज पहचान कर अस्वीकार करे। प्रशासन की आँखें अब खुलनी चाहिए। क्योंकि जब बेटियाँ सुरक्षित नहीं होतीं, तब कोई भी सभ्य समाज होने का दावा नहीं कर सकता। अब शब्द नहीं, न्याय चाहिए। अब बयान नहीं, कार्रवाई चाहिए। और ऐसी कार्रवाई चाहिए जो आने वाली पीढ़ियों को यह विश्वास दे सके कि इस देश में बेटियों की अस्मिता सबसे ऊपर है।



























