शशि कुड़ियाल “चंद्रभा ‘, देहरादून
चलो लेखक से पहले पाठक बनें,
वक्ता से पहले श्रोता रहें
सीखने की ललक जीवंत रख,
ज्ञान के हम प्रद्योता बनें।
पहले सराहें प्रतिभा किसी की,
फिर अपनी प्रशंसा सुनें
स्वयं के लिए तालियों की चाहत हो,
तो पहले दूजों के लिए तालियों की धुन चुनें l
सराहना’ की ख्वाहिश तो इस दुनिया में,
हर दिल को रहती है मेरे दोस्त
प्रोत्साहन के दो शब्द हम भी,
आओ आज किसी को कहें l
जगत हो या आभासी पटल,
रिश्ता दो तरफ़ा ही चलता है
दम तोड़ देते हैं इक तरफ़ा रिश्ते
इस सत्य को सदा खुद से कहें l
मिटाकर मन का द्वेष अहंकार,
प्रेम सौहार्द का पावन स्रोत बनें
शिखर पर कहीं पहुंचने से पहले,
गिरते हुओं की चलो ओट बनें।
सींचें हम सद्भावना के बीज,
संवेदना का सच्चा प्रद्योत बनें
सूरज न भी बन सकें अगर तो,
किसी के अंधेरे की जोत बनें।



























