शशि कुड़ियाल “चंद्रभा”
देहरादून। कुछ समय पहले मैं राजस्थान गई थी वहां एक फोर्ट देखते हुए जब मैंने अपने गाइड से राजस्थान की संस्कृति और गौरवमयी इतिहास की प्रशंसा की तो गाइड ने कहा कि “मैम आप देवभूमि उत्तराखंड से आए हैं न वहां तो सब लोगों में दैविक गुण होते होंगे न, वहां के आमजन मानस भी बहुत भले होते होंगे ना ” मैं उनकी बात सुनकर मुस्कुरा दी थी साथ ही बहुत गर्व महसूस हुआ कि हमारे उत्तराखंड की अन्य राज्यों में इतनी सुंदर छवि है l लेकिन आज यह देवभूमि असुर भूमि बनने की तरफ़ अग्रसर हो रही है क्योंकि आज यह अपराधों और अपराधियों का गढ़ बनता जा रहा है एक ऐसा राज्य जहां देहरादून में एक लड़की की मुख्य बाज़ार में भारी भीड़ के बीच दिन दहाड़े गला काटकर निर्दयता से हत्या कर दी जाती है क्योंकि उसका कसूर यह था कि उसने एक शादीशुदा आदमी से कोई भी संबंध रखने से मना कर दिया था l और हत्या के बाद हत्यारा हवा में रक्तरंजित हथियार को ऐसे लहराता है मानों कानून व्यवस्था को चुनौती दे रहा हो। यकीन नही आता कि यह सब कोई फिल्मी दृश्य नही बल्कि वास्तविकता में घटित घटना है और वो भी उत्तराखंड में।

इसी तर्ज पर ऋषिकेश में एम्स में कार्यरत एक महिला की भी गोली मारकर हत्या की जाती है तो वहीं एक युवा क्षेत्रवाद और प्रांतवाद के नाम पर कत्ल कर दिया जाता है और अंकिता प्रकरण तो उत्तराखंड के लिए एक काला धब्बा बन ही चुका है जहां एक गरीब लड़की ने अपनी जान इसलिए गंवा दी क्योंकि उसे अपनी अस्मिता और आत्मसम्मान से खिलवाड़ मंजूर नही था और अब फिर से दिनदहाड़े एक व्यक्ति की गोली मारकर हत्या। सोचने की बात है कि आखिर क्यों इन अपराधियों को किसी का डर नहीं है न कानून का और ना ही न्याय व्यवस्था का ?आख़िर झोल कहां है ? खासतौर पर महिलाएं तो बिल्कुल भी सुरक्षित नही रह गईं है अब। जब भरी भीड़ में हत्या हो रही है तो अब तो बलात्कार भी छुप कर नही बल्कि दिनदहाड़े होने लगेंगे l आखिर शासन प्रशासन का इन अपराधियों को कोई ख़ौफ़ क्यों नही है l क्यों इन अपराधियों के हौंसले इतने बुलंद हैं ?? यूपी जैसे प्रदेश में भी आज शांति और कानून व्यवस्था भली भांति व्याप्त हो चुकी है पर उत्तराखंड का वर्तमान और भविष्य आज दांव पर लगा है। जब कोई घटना घटित हो जाती है तो हम कैंडल मार्च निकालकर और सेल्फ़ी खींचकर अपने कर्तव्यों की इति श्री कर लेते हैं किंतु जब कोई वास्तव में इस प्रकार की घटना को घटित होने से रोकने की कोशिश करता है तो उसे समाज का भी सहयोग नही मिलता बल्कि मानसिक प्रताड़ना और विभिन्न आरोप भी झेलने पड़ते हैं। जहां हेलमेट न पहनने पर पुलिस आपको अच्छी खासी परेड करा देती है जो कि वाजिब भी है किंतु वहीं एक लड़की की जान के खतरे संबंधित शिकायत को इतने हल्के में क्यों लिया जाता है?? क्यों आज सड़कों पर अनायास ही खतरनाक खूनी खेल खेला जा रहा है ?? कुछ मामले प्रकाश में आते हैं लेकिन जो दब जाते हैं या दबाए जाते हैं उनका क्या? आज पुलिस, शासन और प्रशासन को अपनी कार्यनिष्ठता के प्रति अधिक सचेत होने की आवश्यकता है l दूल्हा बाजार जैसी घटनाओं में जहां अपराधी और अपराध को लेकर कोई संशय की स्थिति नहीं है वहां ऐसे मामलों में तुरंत कड़ी कार्रवाई करके सज़ा के तौर पर ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जाना चाहिए कि अपराध करने की सोचने पर ही अपराधी की रूह कांप जाए। जनता को भी चाहिए़ कि हम कानून व्यवस्था का सहयोग करें। और ऐसी अपराधिक घटनाओं को बिल्कुल भी नॉर्मलाइज न करें। क्योंकि अभी हमारे लिए महज़ यह खबर हो सकती है लेकिन क्या पता कब कौन स्वयं भी इन खबरों का हिस्सा बन जाए। इसलिए शांति पूर्ण तरीके से अपना विरोध जरुर दर्ज करें।

मैंने कहीं पढ़ा था कि अगर आप कुछ कर नही सकते तो बोलिए, बोल नही सकते तो लिखिए और लिख भी नही सकते तो जो लिख रहा है उसका समर्थन कीजिए। आइए अपने उत्तराखंड के “देवभूमि” विशेषण का सम्मान और रक्षा करें कहीं ऐसा न हो कि देवभूमि की बजाए इसकी गिनती अपराध के लिए मशहूर राज्यों में होने लगे। अंग्रेजी में एक idiom है ” Nip in the bud” अर्थात “सर उठाते ही कुचल देना” तो बस यही करना होगा शासन प्रशासन और जनता को मिलकर l























