Home उत्तराखंड पुस्तक समीक्षा: दिल से दिल तक

पुस्तक समीक्षा: दिल से दिल तक

276

पुस्तक: दिल से दिल तक
विधा: काव्य संग्रह
लेखिका: शशि कुड़ियाल “चन्द्रभा” देहरादून
समीक्षक: ऋषभ मैठाणी (लेखक/ सोशल एक्टिविस्ट, रुद्रप्रयाग)

‘दिल से दिल तक’ शीर्षक को चरितार्थ करता काव्य संग्रह है। शशि कुड़ियाल की कलम भावनाओं की तीव्रता और जीवन के यथार्थ दोनों को एक साथ साधती है। यह संग्रह उपदेश नहीं देता, आईना दिखाता है।

काव्य-संवेदना के मुख्य स्तंभ:

  • आध्यात्मिक चेतना: संग्रह का आरम्भ सरस्वती वंदना से होता है जहाँ लेखिका अवगुणों के सुधार की प्रार्थना करती हैं। ‘जान गई मैं’ राधा-कृष्ण के बहाने अपूर्णता के दर्शन को छूती है। हर इच्छा का फूल नहीं खिलता, यह स्वीकारोक्ति पाठक को ठहरकर सोचने पर विवश करती है।
  • स्त्री विमर्श: ‘ना परी ना तू अप्सरा’ समाज के दोहरेपन पर तीखा प्रहार है। घर में देवी, बाहर देह, इस विडंबना को लेखिका ने बेबाकी से लिखा है। ‘चल अब तू जी ले ज़रा’ नारी के लिए आत्मघोष है तो ‘एक बेटी के लिए माँ का संदेश’ पीढ़ियों का संवाद बन जाता है।
  • राष्ट्र और परिवार: ‘बेटा हमारा फौज में है’ केवल कविता नहीं, वर्दी के पीछे छूटे घरों की सिसकी है। सैनिक परिवारों के गौरव और दर्द को इतनी आत्मीयता से बहुत कम लिखा गया है। ‘बालमन निर्मल होता है’ पैरेंटिंग पर मनोवैज्ञानिक दस्तावेज जैसा है। दूसरे बच्चे के आगमन पर पहले बच्चे की उपेक्षा को यह कविता गहराई से पकड़ती है।
  • सामाजिक सरोकार: ‘राजनीति और मित्रता’ लोकतंत्र की मूल भावना याद दिलाती है कि मतभेद हों, मनभेद न हों। ‘पहाड़ों की वेदना’ विकास की अंधी दौड़ में उजड़ती प्रकृति का रुदन है। ‘सच्ची श्रद्धांजलि’ मृत्युभोज से बड़ी जीवित माता-पिता की सेवा को बताकर ढोंग पर प्रहार करती है।
  • व्यावहारिक दर्शन: ‘ज़रा ध्यान से’ और ‘ये तुम जान जाना’ जैसी रचनाएँ रिश्तों का व्याकरण सिखाती हैं। दुख किससे बाँटना है और हद पार करने वाले को दिल में कहाँ रखना है, यह विवेक कविता के माध्यम से आता है।

शशि जी की सबसे बड़ी ताकत सरलता है। क्लिष्ट बिम्बों या भारी तत्सम शब्दों का मोह नहीं है। भाषा आम बोलचाल की है पर भाव असाधारण हैं। हर कविता एक पूर्ण कहानी कहती है। प्रवाह ऐसा कि एक बैठक में पूरी पढ़ जाएँ।

यह संग्रह एक साथ माँ, बेटी, नागरिक, प्रकृति-प्रेमी और आध्यात्मिक जिज्ञासु, सबको कुछ देता है। भावुकता है पर भटकाव नहीं। आक्रोश है पर कटुता नहीं। ‘कलम हमने उठा ली है’ जैसी पंक्तियाँ उम्र के किसी भी पड़ाव पर नए सिरे से शुरू करने का हौसला देती हैं।

उन सभी के लिए जो कविता में सिर्फ तुकबंदी नहीं, जिंदगी तलाशते हैं। स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों से लेकर गृहणियों और सेवानिवृत्त बुजुर्गों तक, हर संवेदनशील व्यक्ति के लिए।

‘दिल से दिल तक’ बाजार में बिकने वाली दर्जनों कविता पुस्तकों से अलग है क्योंकि यह दिल से लिखी गई है। कुछ कविताओं में पुनरावृत्ति का दोष आ सकता था, पर भाव की सच्चाई उस कमी को ढक लेती है। यह संग्रह संजोकर रखने और बार-बार पढ़ने लायक है।