नेहा खत्री, जयपुर (राजस्थान)
माॅं ममता की मूर्तिमान प्रतिमूर्ति है,
हर श्वास में रची-बसी एक रूहानी नज़्म है,
छल-कपट से कोसों दूर,
निर्मल, पाकीज़ा, स्नेह-सिक्त उसकी सीरत है,
बिन कहे ही अल्फ़ाज़ों को पढ़ ले,
दिल की गहराइयों का अहसास कर ले,
माॅं वह बेमिसाल मोहब्बत का दरिया है, जिसमें हर जज़्बात रौनक बनकर उभर उठे,
हर दुआ में जो
औलाद की सलामती की इल्तिज़ा करे,
माॅं वह रहमतों की फरियाद है,
जो खुद में ही खुदाई का नूर समेटे,
माॅं वह रौशन चराग़ है,
जो हर तारीकी को उजाला कर दे,
अपने अरमानों का क़ुर्बान कर
औलाद की राह आसान कर दे,
माॅं वह आंचल-ए-वात्सल्य है,
जिसमें हर ग़म सिमट जाता है,
उसकी प्यारी सी मुस्कान से
हर दर्द ख़ामोश हो जाता है,
वह सब्र की मिसाल है,
कुर्बानी की जीती-जागती तसवीर,
माॅं के क़दमों में ही बसता है
ज़िंदगी का असली ताबीर,
माॅं को बयाॅं करना
निहायत मुश्किल, लगभग नामुमकिन,
न वह लफ़्ज़ों में महदूद हो सकती है,
न किसी मिसाल में मुकम्मल उतर पाती है,
माॅं तो वह अनमोल कुदरत है
जो हर दिल में हमेशा आबाद रहती है।



























