कागजों में योजनाएं, भाषणों में आंकड़े लेकिन जमीन पर खाली गांव, टूटती सड़कें, बंद स्कूल और सूने श्मशान यही है मोदी, धामी और पूर्ववर्ती सरकारों का विकास माडल
आज पहाड़ विरान और शहर आबाद होते जा रहे हैं। भले ही सरकार की मंशा कागजों में ग्रामीण क्षेत्रों को आबाद करने की रही हो परन्तु धरातल पर उनकी यह अधूरी बनी कागजी कार्रवाई कहीं पर भी नजर नहीं आती। आज पहाड़ के ग्रामीण क्षेत्र शिक्षा, स्वास्थ्य, नेटवर्किंग जैसे मूलभूत संसाधनों से वंचित हैं तो यह सरकार की उन खामियों को भी दर्शाता है जिस पर सरकार को ठोस नीति के साथ स्वंय पहाड़ चढ़ना चाहिए था। पहाड़ के ग्रामीण क्षेत्र प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर कार्य करते हैं। एक दौर वह भी था जब लकड़ी में खाना बनता था और लोग उसका आनन्द बड़े चाव से लिया करते थे। मनुष्य को गैस, सुगर जैसी बिमारियां भी नहीं हुआ करती थी। मनुष्य स्वयं अन्नाज का उत्पादन करता और उसका स्वयं भी उपभोग करता और अन्य लोगों को भी देता परन्तु आज के बदलते राजनैतिकों ने पहाड़ो के विकास से ज्यादा अपने लाभ की योजनाओं पर बल दिया जिसके कारण आज बेरोजगारी की मार दिन प्रतिदिन तेजी से बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि आज रूपये का भाव भी दिन प्रतिदिन घटता जा रहा है। एक तरफ सरकार बड़े-बड़े मंचों से ढोल पीट रही है कि “रिवर्स पलायन में हमें जीत मिली, 60% लोग पहाड़ों में वापस आ रहे हैं” और दूसरी तरफ हकीकत ये है कि पहाड़ के गांवों में अर्थी उठाने के लिए भी कंधे नहीं मिल रहे। पिथौरागढ़ के सीमांत गांवों जो कि बार्डर क्षेत्रों से लगे हुए हैं तेजी से खाली हो रहे हैं। यही हाल उत्तराखंड के अन्य बोर्डर क्षेत्रों का भी है। युवा शहरों में मजदूरी कर रहे हैं, बुज़ुर्ग अकेले गांवों में दम तोड़ रहे हैं, और अंतिम यात्रा तक के लिए लोग नहीं मिल पा रहे। ये है आज के राजनेताओं का “विकास” ? सच तो ये है कि एक ग्राम प्रधान भी ग्राम प्रधान बनने के बाद भी गांवों में रहना पसन्द नहीं कर रहा। शिक्षा और नेटवर्को की व्यवस्था देखकर वह अपने आने वाले कल की चिंता कर पलायन करने को मजबूर हैं। आज के हालत ऐसे हैं कि अधिकांश लोग थोड़ा धन-धान्य होते ही शहरों में निवासरत होने को मजबूर हैं। कागजों में योजनाएं, भाषणों में आंकड़े लेकिन जमीन पर खाली गांव, टूटती सड़कें, बंद स्कूल और सूने श्मशान। पहाड़ को भाषण नहीं, ईमानदार नीति और जमीन पर काम चाहिए। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने एक बयान ” उत्तराखंड के अधिकारी बेलगाम” से जनता को बता दिया कि कुछ अधिकारियों की पहुंच उच्च केन्द्रीय मंत्रियो तक होने के कारण वह उनका कुछ नहीं कर पा रहे हैं। जिससे वह अधिकारी बेलगाम होकर ऐसे निर्णय ले रहे हैं जो भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं। एक तरह से कह सकते हैं कि ये बेलगाम अधिकारी ही भ्रष्टाचार की मूल जड़े हैं। जल्द ही इन बड़े राजनैतिक घरानों से ताल्लुक रखने वाले बेलगाम अधिकारियों का भी भंडाफोड़ होगा। बहरहाल इतना ही कह सकते हैं कि इन बेलगाम अधिकारियों के नाम उत्तराखंड प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, सांसद अजय भट्ट, पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज या फिर विपक्ष के नेतागण ही बता सकते हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर कहां से आते हैं ये बेलगाम अधिकारी, कौन है ये जिन्हें आज उत्तराखण्ड के नेताओं द्वारा बेलगाम अधिकारी की संज्ञा दी जा रही है। अब प्रश्न यह भी उठता है कि क्या ये अधिकारी केन्द्रीय मंत्रिमंडल की पकड़ रखते हैं इसलिए अपनी मनमानी कर रहे हैं या फिर इसलिए बेलगाम कहें जा रहे हैं क्योंकि यह आज के नेताओं की मनमानी पर रोक लगा रहे हैं? इस सवाल का उत्तर तो यही नेतागण दे सकते हैं जो उत्तराखंड के अधिकारियों को बेलगाम की संज्ञा दे रहे हैं। खैर पलायन बदस्तूर जारी है। गांव का युवा जिला, जिले का युवा शहर और शहरों के युवा विदेश जाने को मजबूर हैं। जिसके कारण आज गांव पूरी तरह विरान और मैदान आबादी बटोर रहे हैं जो आने वाले कल के लिए भयावह संकेत है।























