तो क्या व्यक्तिगत लाभ कमाना ही नेताओं और अधिकारियों का है पहला लक्ष्य
शहरों की इस चकाचौद में पहाड़ो की पीड़ा को सायद ही कोई समझे, सोशल मीडिया में भी भले ही चेहरे चमकाने की होड़ सी लगी हो परन्तु पहाड़ अब विरान होते जा रहे हैं। पहले बन्दर पहाड़ चढ़े, गुलदार ने भी पहाड़ चढ़ना शुरू कर दिया और अब भालू भी पहाड़ चढ़ गया। पहाड़ का तात्पर्य पहाड़ के ऐसे क्षेत्रों से है जहां मानव निवासरत है। बंदरों से किसी तरह इन्सान ने बचना सिखा ही था कि गुलदार मानव पर हमलावर हो गया, अब गुलदार के बाद भालू भी मानव जाति के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। पहाड़ो में फसल तो पहले ही बन्दरो ने तबाह कर दी थी, बचा खुचा सुअर बर्बाद कर देते थे अब तो जंगलों से घर के पालतू जानवरों के लिए चारा लाना बमुश्किल हो गया है। कहीं कहीं तो घर के आंगन से ही गुलदार नन्हें नौनिहालों को अपना शिकार भी बना चुका है।अब भालू भी मानवजाति पर हमलावर होकर गुलदार की रही सही कसर को पूरा करने में जुट गया है। वैसे देखा जाए तो पहाड़ में जीवन अब पहले से भी दुभर हो चला है। चुने हुए जनप्रतिनिधि भी गांव से ज्यादा शहरों में ही अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं, हालांकि अधिकांश सरकारी कर्मचारियों का भी यही हाल है।थोड़ा बहुत फौजी पहाड़ो में रहते थे उन्हें भी सरकार की गैर सरकारी योजनाओं ने पलायन करने पर मजबूर कर दिया। शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं भी सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में मुहैय्या कराने में पूरी तरह असफल रही। राज्य को बने 25 वर्ष हो गये है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी फोन के नेटवर्क पूरी तरह से लापता है जो इस टेक्नोलॉजी के युग में अपने आप में बहुत गम्भीर विषय है। सरकार भले ही अखबारों, टीवी चैनलों, सोशल मीडिया आदि के माध्यम से विकास के लाख दावे करें धरातल पर इनके दावे पूरी तरह से खोखले नजर आते हैं। पहले बन्दर, गुलदार, जंगली सुअर जैसे जानवरों ने गांवों में रह रहे मानवजाति पर हमला किया था तो अब उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में भालू भी मानवजाति के लिए घातक होते दिख रहे हैं। खैर अब प्रश्न यह उठता है कि जहां ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे लोगों के लिए जीविकोपार्जन पहले ही कठिन रहा हो वहां ऐसे जंगली जानवरों के हमलावर होने से उनके जीविकोपार्जन पर कितना असर पड़ रहा होगा? बहरहाल यही कह सकते हैं कि सरकार अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए कार्य कर रही है तो वही दूसरी और सरकारी कर्मचारी भी अपने व्यक्तिगत लाभ तक ही सिमट कर रह गया है। यह कहना कदापि अनुचित न होगा कि आज पहाड़ों में जंगली जानवरों का आतंक दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है और जनता द्वारा चुनी हुई सरकार इसको लेकर बिल्कुल भी गम्भीर नहीं है। सरकारें आएंगे और जाएंगे लेकिन भविष्य उन्हीं को याद रखता है जो व्यक्तिगत लाभ की अपेक्षा जनहितैषी रहा हो। बहरहाल ऐसा उत्तराखंड राज्य में कोई बड़ा नेता या अधिकारी नजर नहीं आ रहा जिसे लोग लम्बे समय तक याद रख सकें।



























