मीना जोशी ‘मनु’ हल्द्वानी, उत्तराखण्ड
हल्द्वानी। ”उड़ने दें उन्हें भी जिनके पंखों में आसमान है, स्त्री हो या पुरुष—समानता ही इंसान की पहचान है।”
21वीं सदी मानव सभ्यता के इतिहास में परिवर्तन, चेतना और अधिकारों के विस्तार का युग है। विज्ञान, तकनीक, वैश्वीकरण और लोकतांत्रिक मूल्यों ने मानव जीवन को नई दिशा प्रदान की है। फिर भी इन सभी प्रगतियों के बीच एक प्रश्न आज भी समाज के सामने उपस्थित है—क्या वास्तव में समाज सभी के लिए समान और न्यायपूर्ण बन पाया है? विशेष रूप से स्त्री और पुरुष के बीच अवसरों, अधिकारों और सम्मान के स्तर पर जो असमानता दिखाई देती है, वह हमें लैंगिक न्याय की आवश्यकता का गहन बोध कराती है। लैंगिक न्याय केवल महिलाओं के अधिकारों की रक्षा तक सीमित अवधारणा नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक व्यवस्था की स्थापना का प्रयास है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को उसके लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव का सामना न करना पड़े। यह सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समान भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में एक व्यापक और मानवीय दृष्टिकोण है। वास्तव में लैंगिक न्याय एक ऐसे समाज की कल्पना करता है जहाँ समानता केवल संविधान के पन्नों में न रहे, बल्कि सामाजिक व्यवहार और जीवन-व्यवस्था का स्वाभाविक अंग बन जाए।
इतिहास के लंबे कालखंड में स्त्रियों को समाज में गौण स्थान दिया गया। उन्हें शिक्षा, संपत्ति, निर्णय-निर्माण और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी से वंचित रखा गया। अनेक सामाजिक परंपराएँ और रूढ़ियाँ ऐसी थीं जिन्होंने स्त्रियों को सीमित भूमिकाओं में बाँध दिया। परिणामस्वरूप लैंगिक असमानता समाज की संरचना में गहराई तक समाहित हो गई। आधुनिक युग में जब मानवाधिकारों की चेतना विकसित हुई, तब यह महसूस किया गया कि किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब स्त्री और पुरुष दोनों को समान अवसर और सम्मान प्राप्त हो। भारत का संविधान इसी समानता और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है। संविधान निर्माताओं ने यह सुनिश्चित किया कि महिलाओं और पुरुषों के बीच किसी भी प्रकार के भेदभाव न हो। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता देता है, तो अनुच्छेद 15 लिंग आधारित भेदभाव को निषिद्ध करता है। अनुच्छेद 16 और 39(d) क्रमशः अवसर की समानता, समान रोजगार और समान कार्य के लिए समान वेतन की वैधानिक आधारशिला रखते हैं। अनुच्छेद 39 राज्य को निर्देश देता है कि वह अपनी नीतियां इस प्रकार बनाए जिससे सभी नागरिकों (स्त्री और पुरुष) को आजीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो।
इन संवैधानिक मूल्यों को साकार करने के लिए भारत में समय-समय पर अनेक महत्वपूर्ण कानून बनाए गए हैं। ‘घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम (2005)’ परिवार के भीतर सुरक्षा सुनिश्चित करता है, तो ‘कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम) अधिनियम (2013)’ उनकी व्यावसायिक गरिमा की रक्षा करता है। इसी प्रकार ‘समान पारिश्रमिक अधिनियम’ आर्थिक स्तर पर भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास है। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि केवल कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं होता। कानून समाज को दिशा देते हैं, परंतु उनकी वास्तविक प्रभावशीलता समाज की मानसिकता और व्यवहार पर निर्भर करती है। आज भी अनेक स्थानों पर पितृसत्तात्मक सोच और सामाजिक पूर्वाग्रह महिलाओं की प्रगति में बाधा बनते हैं। इसलिए आवश्यक है कि समाज अपनी सोच में परिवर्तन लाए और समानता के मूल्यों को व्यवहार में अपनाए।
परिवर्तन की इस प्रक्रिया में परिवार पहली पाठशाला है। यदि परिवार में ही लड़के और लड़कियों के साथ समान व्यवहार किया जाए और उनके सपनों का सम्मान किया जाए, तो यह बदलाव समाज में व्यापक रूप से दिखाई देने लगेगा। शिक्षा संस्थान, मीडिया, साहित्य और कला भी इस चेतना को फैलाने के प्रभावी साधन हैं। 21वीं सदी में महिलाओं की उपलब्धियाँ इस परिवर्तन का सशक्त प्रमाण हैं। आज महिलाएँ शिक्षा, विज्ञान, प्रशासन और खेल जैसे हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा से समाज को समृद्ध बना रही हैं। फिर भी यह यात्रा अभी पूर्ण नहीं हुई है। लैंगिक वेतन अंतर, बाल विवाह और सामाजिक रूढ़ियाँ आज भी बड़ी चुनौतियाँ हैं।
निष्कर्षतः, लैंगिक न्याय केवल एक कानूनी प्रश्न नहीं है, बल्कि यह एक समतामूलक और मानवीय समाज की आधारशिला है। कानून इस दिशा में मार्गदर्शक शक्ति है और समाज उसकी आत्मा। जब कानून की शक्ति और समाज की संवेदनशीलता एक साथ कार्य करेंगी, तभी एक ऐसा भारत निर्मित होगा जहाँ प्रत्येक व्यक्ति—चाहे वह स्त्री हो या पुरुष—समान अधिकारों, अवसरों और सम्मान के साथ अपना जीवन जी सकेगा। समानता का संकल्प तभी पूर्ण होगा जब घर की देहली से देश की संसद तक, अवसर और अधिकार सबके लिए समान होंगे। तो आइए, हम इस समानता की शुरुआत अपने विचारों और अपने घरों से करें, क्योंकि एक न्यायपूर्ण समाज की पहचान उसके द्वारा दिए गए समान अवसरों में ही निहित है।























