Home उत्तराखंड नारी शक्ति, समर्पण और संकल्प का प्रतीक वट सावित्री व्रत

नारी शक्ति, समर्पण और संकल्प का प्रतीक वट सावित्री व्रत

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हल्द्वानी । वट सावित्री व्रत का तिकोनिया, हल्द्वानी स्थित वैष्णो देवी मंदिर में विधिवत संपन्न होना क्षेत्र के लिए आस्था का बड़ा पर्व रहा। वट सावित्री, जिसमें सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए वट वृक्ष की पूजा करती हैं। स्थानीय महिलाओं के साथ-साथ दूर-दराज के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु महिलाएं पूजा के लिए पहुंची। जहां विधि-विधान से वट वृक्ष की परिक्रमा, कच्चा सूत लपेटना, कथा श्रवण और सावित्री-सत्यवान की कथा का पाठ किया गया। आमतौर पर ज्येष्ठ अमावस्या पर रखा जाने वाला ये व्रत पति-पत्नी के अटूट प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। हल्द्वानी में हर साल तिकोनिया मंदिर इस दिन विशेष सजता है और श्रद्धालुओं की काफी भीड़ रहती है। ये सुहागिन महिलाओं का सबसे बड़ा व्रत माना जाता है। कथा के अनुसार सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस मांगे थे। जब सत्यवान की मृत्यु हुई तो यमराज उनके प्राण लेकर जाने लगे। सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल दी। वट वृक्ष के नीचे ही सावित्री ने यमराज से अपने पति के प्राणों के साथ-साथ सास-ससुर की आंखों की रोशनी और राज्य वापस मांगा। सावित्री के पतिव्रता धर्म और दृढ़ संकल्प से प्रसन्न होकर यमराज ने सत्यवान को जीवनदान दिया। तभी से ये व्रत पति की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है। वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों देवों का वास माना जाता है। इसकी जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में शिव का वास है।

वट वृक्ष दीर्घायु और स्थिरता का प्रतीक है। ये व्रत नारी शक्ति, समर्पण और संकल्प का प्रतीक है। सावित्री की तरह हर स्त्री अपने परिवार के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। ज्येष्ठ की गर्मी में वट वृक्ष 24 घंटे ऑक्सीजन देता है। इसकी पूजा से प्रकृति संरक्षण का संदेश मिलता है। महिलाएं एक जगह इकट्ठा होकर कथा सुनती हैं, जिससे सामाजिक मेल-जोल बढ़ता है। निर्जला या फलाहार व्रत से शरीर डिटॉक्स भी होता है। इस दौरान सुहागिन महिलाओं द्वारा 16 श्रृंगार करके वट वृक्ष को कच्चा सूत लपेटते हुए 7 बार परिक्रमा की गयी। ये व्रत अटूट प्रेम, अखंड सौभाग्य और नारी के संकल्प की शक्ति का उत्सव है।