Home उत्तराखंड ये सिर्फ आग नहीं है, पहाड़ का दम घुट रहा है

ये सिर्फ आग नहीं है, पहाड़ का दम घुट रहा है

2028

पर्यावरण प्रेमी, शंकर सिंह बिष्ट

चारों ओर जहाँ भी नज़र घुमाओ, जंगल धधकते दिखाई दे रहे हैं। इन जलते जंगलों से उठता धुआँ, चिंगारियाँ और लपटें मानों मनुष्य के अस्तित्व पर ही प्रहार कर रही हों। मन व्याकुल है, ऐसा लगता है जैसे भीतर कहीं किसी अँधेरे तहखाने में कैद हो जाना चाहता हो। मौन हो जाना चाहता है, क्योंकि इन धधकते जंगलों को देखकर हृदय दर्द से भर उठता है। भीतर रोष पैदा होता है, आक्रोश जन्म लेता है। वाणी कटु होने लगती है और मन क्रांतिकारी विस्फोट करना चाहता है, ताकि ये जंगल जलने से बच सकें। मई का महीना चल रहा है और पूरे हिमालयी क्षेत्र के जंगल अक्टूबर से अब तक लगातार तीसरी बार आग की चपेट में हैं। आज चौखुटिया का तापमान रिकॉर्ड तोड़ 36 डिग्री तक पहुँच गया। चारों ओर धुएँ का आवरण फैला हुआ था। मन में बार-बार वही सवाल उठ रहा था, आखिर हम क्या कर पा रहे हैं? जंगल तो हर वर्ष पहले से अधिक मात्रा में जलते जा रहे हैं। यदि केवल चौखुटिया क्षेत्र की ही बात करें, तो पूरे ब्लॉक में आग की सौ से अधिक घटनाएँ हो रही होंगी। आज जब बाज़ार गया, तो लोगों की चिंताएँ और सवाल मन को झकझोर देने वाले थे।
“आने वाले दस वर्षों में जल के लिए हाहाकार मच जाएगा, शंकर भाई…”, “इस जंगल की आग के लिए कुछ करना पड़ेगा…”, हम स्वच्छ वातावरण की तलाश में शहर छोड़कर यहाँ आए थे, लेकिन अब यहाँ भी वही हाल है।
अब प्रश्न यह उठता है कि “ये आग कौन लगा रहा है?”, “आग लगाने वालों को कठोर सजा मिले बिना कुछ नहीं बदलेगा।
“इस धुएँ से आँखों में जलन और गले में खराश होने लगी है…” इन सवालों के सामने मैं स्वयं को असहाय महसूस कर रहा था। भीतर एक पीड़ा थी कि हम मिलकर भी कुछ क्यों नहीं कर पा रहे हैं। साथ ही एक उग्र रोष भी था कि अब केवल चर्चा से काम नहीं चलेगा।आपातकालीन बैठकों, जनजागरण और ठोस आंदोलन की आवश्यकता है। अन्यथा पहाड़ का अस्तित्व धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा। जल स्रोत सूख रहे हैं, स्थानीय वनस्पतियाँ समाप्त होती जा रही हैं, वन्यजीवन संकट में है और हवा में घुलता यह धुआँ हमारे भविष्य का गला घोंट रहा है। यदि आज भी हम नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ नहीं करेंगी। ये सिर्फ आग नहीं है, पहाड़ का दम घुट रहा है। पहाड़ ने हमें गोद में पाला है। अब हमारी बारी है। ये धुआँ अगर आज नहीं रोका, तो कल हमारी सांसें नीलाम होंगी।