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प्रेम और पहाड़

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दया भट्ट
खटीमा, उधम सिंह नगर (उत्तराखंड)

पहाड़ कभी कठोर नहीं होते,
वे भीतर से टूटे हुए लोग होते हैं।
जिन्होंने वर्षों तक
अपनी चट्टानों में
अनकहे प्रेम की पीड़ा दबाई होती है।

उनकी खामोशी में
बहुत सी अधूरी पुकारें सोती हैं,
और उनकी चोटियों पर
किसी के लौट आने की प्रतीक्षा
धुंध बनकर ठहरी रहती है।

समुद्र को प्रेम मिला,
इसलिए वह लहरों में गाता रहा,
किनारों को बाँहों में भरता रहा,
हर दर्द को बहा ले जाता रहा।

पर पहाड़…
वे प्रेम से वंचित रह गए शायद,
इसलिए स्थिर हो गए,
ऊँचे तो बहुत हुए
पर भीतर से
एकाकी और मौन।

किसने कहा कि पहाड़ कठोर हैं?
कठोर तो वे लोग हैं
जो पहाड़ों की आँखों में छिपे आँसू
देख नहीं पाए।

पहाड़ दरअसल
प्रतीक्षा में खड़े वे प्रेमी हैं
जिन्होंने अपने हिस्से की नदी
किसी और के नाम कर दी।

वे स्वयं प्यासे रहे,
पर नदियों को बहना सिखाया,
अपने सीने को चीरकर
झरनों को जन्म दिया,
और फिर भी
बदले में केवल उपेक्षा पाई।

मैंने जब भी पहाड़ों को देखा,
मुझे उनमें
एक स्त्री का मौन दिखाई दिया—
जो सबके लिए जीती रही,
पर स्वयं के हिस्से का प्रेम
कभी माँग न सकी।

पहाड़ों की चुप्पी
दरअसल हार नहीं होती,
वह उन लोगों की अंतिम भाषा होती है
जो प्रेम में टूटकर भी
दुनिया को सुंदर बने रहने देते हैं।

और शायद इसीलिए
उत्तराखंड के पहाड़
आज भी इतने पवित्र लगते हैं—
क्योंकि वहाँ पत्थरों में भी
धड़कते हैं कोमल हृदय,
जो प्रेम को खोकर भी
प्रेम ही बाँटते रहते हैं।