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पिता जी की सीख और ससुर जी की विरासत

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शशि कुड़ियाल “चंद्रभा”

​मेरे व्यक्तित्व, सूरत और स्वभाव पर मेरे स्वर्गीय पिताजी का गहरा प्रभाव है। ईश्वर ने मुझे उनके जैसा ही बनाया है, और आज पितृ दिवस पर मुझे अपने जीवन के दो महापुरुषों की स्मृतियां याद आ रही हैं। एक मेरे स्वर्गीय पिता जी और दूसरे मेरे स्वर्गीय पूज्य ससुर जी।

“​ससुर जी की विरासत”

बात मेरे विवाह के कुछ वर्ष बाद की है l ससुर जी को मैंने कभी देखा नहीं था लेकिन उनकी उदारता और महानता की बातें मैं घर बाहर के लोगों से अक्सर सुनती रहती। हमारे घर के नज़दीकी गांव में रहने वाले एक बुजुर्ग ताऊ जी अक्सर हमारे घर आते थे और बड़ी श्रद्धा से मांजी के पैर छूते थे। हैरान करने वाली बात यह थी कि वे मुझे भी मेरे अभिवादन का उत्तर बड़ा सिर झुकाकर और दोनों हाथ जोड़कर देते थे। मुझे बड़ा अचम्भा होता, पर संकोचवश मैं कुछ कह न पाती।
​एक दिन, जब मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने उनसे पूछ ही लिया कि वे मेरे पिताजी की उम्र के होकर भी मुझे इस तरह क्यों नमन करते हैं? उन्होंने उत्तर दिया, “बेटी! तुझे ही क्या, मैं तो इस आंगन को, इस घर को भी नमन करता हूं ऐसा करके मैं उस इंसान को प्रणाम करता हूं जिनका देवता भी सम्मान करते होंगे और आज शायद उन्हीं देवताओं के मध्य में वे स्वयं भी उपस्थित होंगे । तू ऐसे महान व्यक्ति की पुत्रवधू है, इसलिए मैं तुझे हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूं।” उनकी यह बात सुनकर मेरी आंखें ससुर जी के प्रति गर्व और श्रद्धा से छलक आईं। पूज्य ससुर जी से जुड़े ऐसे एक दो नही अनगिनत अनुभव हैं l
ससुर जी ने अपने जाने के बाद भी सम्मान की जो विरासत छोड़ी थी, वह वही असली विरासत है जिस पर हम सब को बेहद नाज़ है और इतने विराट और देवतुल्य व्यक्तित्व वाले लोक कल्याणकारी शख्सियत की बहू होने पर मुझे सदैव बेहद गौरव की अनुभूति होती है और हृदय सदैव उनके प्रति कृतार्थ रहता है।

“​पिताजी की सीख”

मेरे पिताजी का जीवन मुझे सदैव संयम और शांति का पाठ पढ़ाता है। उन्होंने अपने एक मित्र के साथ मिलकर एक प्राइवेट फ़र्म के लिए पार्टटाइम काम शुरू किया था। शुरुआत में सब अच्छा था, लेकिन धीरे-धीरे वह मित्र अति महत्वाकांक्षी हो गया। वह हर काम का श्रेय खुद लेने लगा l पिताजी को किनारे रखकर सभी निर्णय स्वयं करने लग गया ताकि सिर्फ़ और सिर्फ़ उसकी वाहवाही हो वह केवल अपने लिए प्रशंसा व पुरस्कार की चाह रखने लगा। पिताजी का स्वाभिमानी व्यक्तित्व इसे भांप गया और उन्होंने उस काम से और उस मित्र से दूरी बना ली। हम सब उनके इस तरह से चुपचाप पीछे हटने पर बहुत नाराज़ थे, विशेषकर मैं ।
​तब पिताजी ने मुझे पास बिठाकर जो कहा, वह आज भी मेरे जीवन का मंत्र है। उन्होंने कहा, “बेटा, हर लड़ाई लड़ने के लिए नहीं होती। अपनी हर लड़ाई को सोच-समझकर चुनना।
जब बात अन्याय और अत्याचार की हो, तो ज़रूर लड़ना। लेकिन यदि किसी लड़ाई को लड़कर कुछ हासिल न हो, तो अपनी मानसिक शांति को महत्व देना।
ऐसा करना तुम्हारी कमज़ोरी नही बल्कि समझदारी होगी l
हर बात पर, हर व्यक्ति से लड़ने से तुम मानसिक रूप से कमज़ोर और अशांत हो जाओगी। तुम वह बन जाओगी जो तुम कभी नहीं बनना चाहती थी।”
​आज भी, जब कभी किसी के तुच्छ व्यवहार या व्यर्थ की बातों पर मेरा मन प्रतिक्रिया देने के लिए उतावला होता है, तो मुझे पिताजी की वह सीख याद आ जाती है। वह सीख मेरे अंदर का सारा कोलाहल शांत कर देती है और मुझे एक बेहतर इंसान बनाए रखती है। भले ही मेरे जीवन के ये दोनों ही महापुरुष आज भौतिक रूप से मेरे साथ नहीं हैं, लेकिन ससुर जी की दी हुई ‘सम्मान’ की धरोहर और पिताजी की दी ‘शांति की सीख’, मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी और अनमोल धरोहर हैं l पितृ दिवस के अवसर पर मैं इन दोनों आधार स्तंभों को नमन करती हूं जिन्होंने मुझे न केवल संस्कार दिए, बल्कि जीवन जीने का सही नज़रिया भी दिया।