(आलेख : डॉ. टी.एम. थॉमस इसाक, अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते)
यूडीएफ के मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन द्वारा पेश किया गया केरलम् का संशोधित बजट राजनीतिक रूप से पीछे ले जाने वाला और आर्थिक हिसाब-किताब के नज़रिए से खोखला है, साथ ही, इसमें भ्रष्टाचार के दो मामले भी सामने आए हैं। आइए, उन दो घोटालों से शुरुआत करते हैं, जो विधानसभा में बजट पेश किए जाने और उस पर बहस के दौरान सामने आए हैं।
बजट की शुरुआत पिछली एलडीएफ सरकार के कथित वित्तीय दिवालियापन के ज़िक्र के साथ हुई। फिर भी, इसमें अतिरिक्त राजस्व जुटाने के लिए कोई नया उपाय नहीं सुझाया गया, सिवाय मौजूदा कर से ज़्यादा राजस्व मिलने की उम्मीद के। अजीब बात यह है कि करों से जुड़ा मुख्य प्रस्ताव शराब और बीयर को छोड़कर कम अल्कोहल वाले ड्रिंक्स (शराब) पर कर की दर को 210% से घटाकर 120% करना था, ताकि ज़िम्मेदारी से शराब पीने को बढ़ावा दिया जा सके।
डिस्टिलरीज़ (आसवनी) को राजस्व में छूट
इस फ़ैसले से सबसे ज़्यादा फ़ायदा डिस्टिलरीज़ को, और ख़ासकर बकार्डी कंपनी को होगा। केरलम् में कम अल्कोहल वाले पेय को आयात करने की मंज़ूरी के लिए उसकी अर्ज़ी को एलडीएफ सरकार ने बार-बार ठुकरा दिया था।
पिछली एलडीएफ सरकार ने किसानों द्वारा बनाई जाने वाली हॉर्टी-लिकर और हॉर्टी-वाइन को बढ़ावा देने के लिए बीयर और वाइन के अलावा कम अल्कोहल वाले ड्रिंक्स के लिए एक अलग श्रेणी बनाई थी। हॉर्टी-वाइन पर टैक्स की दर 85% तय की गई थी। हालांकि, बकार्डी द्वारा बनाए गए कम अल्कोहल वाले कॉकटेल को मंज़ूरी नहीं दी गई थी, क्योंकि ऐसे उत्पादों के लिए कर की दर कभी तय नहीं की गई थी।

बकार्डी फ़ाइल तीन साल तक दफ्न रही। नई सरकार के गठन के पहले ही हफ़्ते में इस फ़ाइल को फिर से निकाला गया और कम अल्कोहल वाले ड्रिंक्स पर कर कम करने का प्रस्ताव बजट में शामिल कर लिया गया। इसके लिए यूडीएफ के भीतर कोई चर्चा नहीं हुई, यहाँ तक कि आबकारी मंत्री से भी चर्चा नहीं की गई, जो उनके अपने ही मंत्रिमंडल के सहयोगी थे। विपक्ष के नेता पिनराई विजयन ने सदन में ही भ्रष्टाचार का आरोप लगाया।
इस भ्रष्टाचार का पूरे केरल में बड़े पैमाने पर विरोध हुआ है। यहाँ तक कि सत्ताधारी गठबंधन के कुछ नेताओं ने भी इस पर आपत्ति जताई। फिर भी, नए मुख्यमंत्री अपनी बात पर अड़े रहे और कम कर दर वाला वित्त कानून पारित हो गया। एकमात्र रियायत यह दी गई कि नई कर दर की अधिसूचना की तारीख घोषित नहीं की गई। केरल के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी कर प्रस्ताव पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों।
कम अल्कोहल वाले ड्रिंक्स से जुड़ा विवाद अभी थमा भी नहीं था कि एक नया विवाद खड़ा हो गया। अडानी विझिनजम पोर्ट प्राइवेट लिमिटेड (एवीपीपीएल) ने, जो केरल सरकार की एक संस्था के साथ पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) समझौते के तहत विझिनजम पोर्ट का निर्माण और प्रबंधन कर रही है, ने अपनी 49% शेयर मेडिटेरेनियन शिपिंग कंपनी को बेच दिए। कंपनी ने पोर्ट के मालिक, यानी केरल सरकार से इसके लिए मंज़ूरी नहीं ली थी, जबकि पीपीपी समझौते में ऐसा करना ज़रूरी था। इस मामले और बजट के नए प्रस्तावों के बीच संबंध को समझने के लिए, हमें विझिनजम पोर्ट के इतिहास को फिर से देखना होगा।
विझिनजम पोर्ट का प्रस्ताव मूल रूप से वी एस अच्युतानंदन सरकार (2006–2011) ने ‘लैंडलॉर्ड पोर्ट मॉडल’ के तहत रखा था। इस मॉडल के अनुसार, केरल सरकार पोर्ट बनाती और फिर राजस्व साझेदारी के आधार पर इसे चलाने के लिए खुली निविदा के ज़रिए किसी निजी कंपनी को चुनती। कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने आखिरी समय में इस प्रस्ताव को रद्द कर दिया, क्योंकि पोर्ट बनाने की निविदा जीतने वाली कंपनी के चीन से संबंध थे।
कांग्रेस ने विझिनजम परियोजना अडानी को सौंपी
इसके बाद ओमन चांडी की यूडीएफ सरकार (2011–2016) आई। यूडीएफ ने पोर्ट का पूरा मॉडल ही बदल दिया। उसने अडानी ग्रुप के साथ एक समझौता किया, जिसके तहत अडानी को पोर्ट बनाना और 40 साल तक उसे चलाना था। शुरुआती 30 सालों तक केरल सरकार को कोई मुनाफ़ा नहीं मिलना था। अजीब बात यह थी कि अडानी को कुल निवेश का लगभग 30% यानी करीब 2,500 करोड़ रूपये ही निवेश करना था। बाकी निवेश केरल सरकार को करना था। एलडीएफ ने कांग्रेस-अडानी समझौते की आलोचना करते हुए इसे समुद्री डकैती जैसा काम बताया था।
साथ ही, एलडीएफ नहीं चाहती थी कि यह परियोजना कभी न खत्म होने वाले कानूनी विवादों में फँस जाए। इसलिए, 2016 के अपने चुनावी घोषणा-पत्र में एलडीएफ ने ऐलान किया कि वह यूडीएफ के साथ हुए समझौते का सम्मान करेगी। पिनराई विजयन (2016–2021) के नेतृत्व वाली एलडीएफ सरकार ने उस वादे को निभाया। पोर्ट का पहला चरण सफलतापूर्वक पूरा हो गया और दूसरे चरण का निर्माण कार्य शुरू हो गया। इस पोर्ट को पहले ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल चुकी है और यहाँ स्थानांतरण (ट्रांसशिपमेंट) के लिए रिकॉर्ड संख्या में जहाज़ आ चुके हैं।
अडानी का कुल निवेश सिर्फ़ 2,500 करोड़ रूपये के लगभग होगा। इसलिए, 13,000 करोड़ रूपये में 49% शेयर बेचने का मतलब है कि दस साल से भी कम समय में निवेश के शुरुआती अनुमान से दस गुना से ज़्यादा का फ़ायदा हुआ। यह ठीक वैसा ही अप्रत्याशित लाभ है, जिसके लिए एलडीएफ ने ओमन चांडी पर अडानी के साथ अपनी व्यवस्था के ज़रिए इसे मुमकिन बनाने का आरोप लगाया था।
बजट और नया घोटाला
विझिनजम विवाद और यूडीएफ के नए बजट के बीच क्या संबंध है? बजट का सबसे अहम प्रस्ताव पूरे राज्य को एक सी-पोर्ट सिटी क्षेत्र में बदलना है। कॉर्पोरेट मदद से लॉजिस्टिक्स पार्क, औद्योगिक हब और परिवहन अधोसंरचना से विपणन सुविधाओं के ज़रिए न सिर्फ़ विझिनजम, बल्कि केरल के दूसरे पोर्टो (बंदरगाहों) का भी विझिनजम की तर्ज़ पर विकास किया जाना है। विझिनजम सौदे से संकेत मिलता है कि विकास का यह नया मॉडल सार्वजनिक संसाधनों की निजी हाथों में संगठित लूट का ज़रिया बन सकता है।
अजीब बात है कि ऐसा लगता है कि अडानी कंपनी ने मान लिया था कि केरल सरकार की मंज़ूरी लेना बस एक औपचारिकता है। विपक्ष ने इसे यूडीएफ की जीत के कुछ ही दिनों बाद हुई एक अजीब घटना से जोड़ा है। जब कांग्रेस आलाकमान केरल के मुख्यमंत्री पद के लिए चर्चा कर ही रहा था, तब खबर मिली कि वीडी सतीशन ने अडानी टीम के साथ निजी बैठक के लिए चार्टर्ड फ़्लाइट से मैंगलोर की अचानक यात्रा की। क्या वहाँ शेयरों के हस्तांतरण पर चर्चा हुई थी? मुख्यमंत्री ने अभी तक यह साफ़ नहीं किया है कि क्या अडानी कंपनी ने उनसे अनौपचारिक रूप से इस हस्तांतरण पर चर्चा की थी। विवाद शुरू होने के बाद ही कंपनी ने सरकार से मंज़ूरी के लिए औपचारिक पत्र सौंपा।
मुख्यमंत्री ने घोषणा की है कि अधिकार प्राप्त समिति इस मामले की जांच करेगी और फैसला लेगी। विडंबना यह है कि इस समिति में मुख्यमंत्री, वित्त मंत्री, बंदरगाह मंत्री और कानून मंत्री शामिल हैं। इस सरकार में ये चारों पद एक ही व्यक्ति के पास हैं। जब मुख्यमंत्री ने बंदरगाह विभाग भी अपने पास रखने का फैसला किया, तो कई लोग हैरान रह गए थे। अब सब कुछ समझ में आ रहा है।
सार्वजनिक कर्ज सिंड्रोम
यूडीएफ का बंदरगाह-आधारित विकास मॉडल कॉर्पोरेट निवेश पर इतना ज़्यादा कैसे निर्भर हो गया, जिससे उसे विझिनजम जैसा बड़ा फ़ायदा हुआ? इसका जवाब उस ‘सार्वजनिक कर्ज की कहानी’ में छिपा है, जिसे यूडीएफ ने केंद्र सरकार के साथ मिलकर पिनराई विजयन सरकार को कमज़ोर करने के लिए गढ़ा था।
बजट की शुरुआत राज्य पर कर्ज के बोझ के रूप में 5.07 लाख करोड़ रुपये के बढ़े हुए अनुमान के साथ हुई। फिर भी बकाया देनदारियाँ और सार्वजनिक ऋण एक जैसे नहीं होते हैं। बकाया देनदारियों में सार्वजनिक ऋण और सार्वजनिक खाता देनदारियां दोनों शामिल हैं। सार्वजनिक खाते की देनदारियां बड़े पैमाने पर राजकोष में रखी गई जमा राशि हैं और 2017-18 तक इसे उधार सीमा के हिस्से के रूप में नहीं माना गया था।
लंबी अवधि के आंकड़े बताते हैं कि आंतरिक कर्ज बढ़ने के मामले में भारतीय राज्यों में केरल का स्थान सिर्फ 18वां है। कई बड़े राज्यों में कर्ज बढ़ने की रफ़्तार केरल से ज़्यादा रही है। तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे पड़ोसी राज्यों में 2014-15 और 2023-24 के बीच आंतरिक कर्ज तेज़ी से बढ़ा है। केरल का कर्ज-जीएसडीपी अनुपात, जो कोविड-19 महामारी के दौरान 40% से ज़्यादा हो गया था, कम होने लगा था और 2026 की शुरुआत तक यह लगभग 33.6% तक आ गया था।
कर्ज़ के जाल को लेकर घबराहट जान-बूझकर राजनीतिक मक़सद से फैलाई गई है, ताकि वामपंथी सरकार और ख़ासकर केरल इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट फंड बोर्ड (केआईआईएफबी)’ की विश्वसनीयता को कमज़ोर किया जा सके। केआईआईएफबी सार्वजनिक क्षेत्र की एक संस्था है, जिसे अधोसंरचना विकास के लिए, स्वतंत्र रूप से संसाधन जुटाने के मक़सद से, बनाया गया था।
केआईआईएफबी की आलोचना
बजट में वित्तीय शब्दावली में आया बदलाव केआईआईएफबी के मामले में सबसे साफ़ तौर पर दिखता है। भाषण में 21,000 करोड़ रूपये के जल्द आने वाले रीपेमेंट (कर्ज़ चुकाने) के दायित्व और केआईआईएफबी की चल रही परियोजनाओं को पूरा करने के लिए ज़रूरी अतिरिक्त 35,000 करोड़ रूपये का ज़िक्र है। साथ ही, इसके कामकाज के तरीके में “व्यापक संरचनात्मक सुधार और बदलाव” करने के लिए एक विशेषज्ञ कमेटी बनाने की घोषणा भी की गई है। भाषण में यह तर्क दिया गया है कि केआईआईएफबी की ‘ऑफ़-बजट’ उधारी पर लगने वाला ब्याज सामान्य सरकारी उधारी की तुलना में काफ़ी ज़्यादा है और इसने “राज्य की उधारी और कर्ज़ के बोझ को तय सीमा से ज़्यादा बढ़ा दिया है, जिससे गंभीर बड़े आर्थिक असंतुलन पैदा हो गये हैं।”
यह लगभग वही भाषा है, जिसका इस्तेमाल केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने पिछले लगभग एक दशक से केआईआईएफबी के खिलाफ किया है। केआईआईएफबी को खास तौर पर इसलिए बनाया गया था, ताकि कल्याणकारी राज्य सरकार के सामने आने वाली वित्तीय बाधाओं को दूर किया जा सके और ऐसे अधोसंरचना निवेश के लिए फंड जुटाया जा सके, जिसे सिर्फ़ राजस्व खाते से कभी पूरा नहीं किया जा सकता था।
बजट और उससे पहले आए श्वेत पत्र में इस बात को नज़रअंदाज़ किया गया है कि केआईआईएफबी में भले ही उसके कामकाज से जुड़ी कुछ कमजोरियां हों, लेकिन यह बड़े पैमाने पर संसाधन जुटाने में सक्षम एक सफल वित्तीय नवाचार रहा है। बजट की सबसे बड़ी उपलब्धि इस संस्था की साख को कम करना है। नतीजन, नई सरकार ने कॉर्पोरेट निवेशकों के साथ बातचीत में अपनी मोल-भाव करने की ताकत को कमज़ोर कर लिया है।
बजट की मुख्य बातें
2026–27 का संशोधित बजट दो स्तरों पर काम करता है, जिनमें आसानी से तालमेल नहीं बिठाया जा सकता। एक तरफ, यह संकट और पाबंदियों पर ज़ोर देता है, जिसके तहत योजना के खर्च में कटौती, केआईआईएफबी के पुनर्गठन और वित्तीय कठिनाईयों के लिए पिछली सरकार को ज़िम्मेदार। ठहराता है। दूसरी तरफ, यह भरपूर संसाधनों और बड़ी महत्वाकांक्षाओं की बातों से भरा है, जिसमें दर्जनों हब, मिशन, कॉरिडोर और शहरी परियोजनाओं का ज़िक्र है।
जिस राज्य की आर्थिक स्थिति तंग हो — जहाँ राजस्व से होने वाली कमाई का 77% हिस्सा निश्चित खर्चों में ही चला जाता हो, पूंजीगत व्यय जीएसडीपी का सिर्फ़ 1.3% रह गया हो, और कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च की मांगें बढ़ रही हों — उसके पास भाषण में किए गए वादों को वित्त पोषित करने के लिए ज़रूरी आर्थिक गुंजाइश नहीं है। कमजोरी या तो राजस्व जुटाने की किसी ठोस रणनीति की है, या फिर उस विकास वित्त तंत्र तक पहुँच की है, जिसे केआईआईएफबी के ज़रिए उपलब्ध कराने के लिए बनाया गया था।
नतीजन, बजट में दिखावटी तौर पर तो बहुत कुछ देने की बात की गई है, जिसके लिए सिर्फ़ नाम-मात्र का पैसा रखा गया है, जबकि वास्तव में तो योजना के खर्च में कटौती ही की गई है। इसकी मुख्य विशेषता खर्च में कटौती है, जो महिलाओं की सुरक्षा के लिए मासिक भुगतान योजना और चुनाव प्रचार के दौरान किए गए अन्य कल्याणकारी “गारंटियों” जैसी बिना फंड वाली कल्याणकारी योजनाओं में साफ़ दिखती है। यहाँ तक कि वीबी ग्राम-जी को भी केंद्रीय आबंटन के साथ मिलकर काम करने के लिए ज़रूरी रकम का सिर्फ़ आधा हिस्सा ही मिला है।
निजीकरण का एजेंडा
ये आर्थिक दबाव बजट को निजीकरण के एजेंडे की ओर ले जाते हैं। दशकों से जमा की गई सरकारी और विभागीय ज़मीन को एक “भूमि बैंक” में इकट्ठा किया जा रहा है, ताकि निजी निवेशकों को तेज़ी से और एक ही जगह से मंज़ूरी (सिंगल-विंडो क्लीयरेंस) मिल सके। इससे बेकार पड़ी संपत्तियों को “अनलॉक” करने (काम में लाने) के नाम पर सरकारी बैलेंस शीट को सब्सिडी वाली ज़मीन के रिज़र्व में बदलने का जोखिम पैदा होता है। इस भाषण में राजस्व को साझा करने, इक्विटी में हिस्सेदारी या समुदाय से बातचीत करने जैसा कोई वादा नहीं किया गया है।
भाजपा सरकार के बारे में चुप्पी
अजीब बात है कि बजट में भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के बारे में लगभग पूरी तरह से चुप्पी साध ली गई है। केंद्र सरकार की आलोचना का एकमात्र ज़िक्र वीबी-ग्राम-जी के लिए अपर्याप्त आबंटन की घोषणा में मिलता है। चुनाव के समय भाजपा और कांग्रेस के बीच बनी समझ चुनाव नतीजों के आधार पर लगभग तीस निर्वाचन क्षेत्रों में साफ़ दिखती है। यूडीएफ सरकार के कार्यकाल में भी ‘नरम हिंदुत्व’ का रुख़ जारी रहा है।
केरल की वित्तीय कठिनाई वास्तविक है और इस पर गंभीरता से ध्यान देने की ज़रूरत है। फिर भी, बजट केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संबंधों में मौजूद गहरे असंतुलन को काफी हद तक नज़रअंदाज़ करता है। इसके बजाय, यह राज्य के अपने विकास संस्थानों को अनुशासित करने के लिए पारंपरिक वित्तीय सोच वाली भाषा अपनाता है, और साथ ही विकास पर होने वाले खर्च में कमी को छिपाने के लिए बड़ी-बड़ी परियोजनाओं की महत्वाकांक्षी बातें करता है। यह मिला-जुला रवैया तबाही का कारण बन सकता है।
(लेखक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री, माकपा के केंद्रीय समिति सदस्य और केरल के पूर्व वित्त मंत्री हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)






























