ललिता कापड़ी
आज सड़क पर एक महिला को ऑटो चलाते देखा। मन एक पल को ठहर गया। समझ नहीं आया कि खुश होऊँ या दुखी। दुख इसलिए कि कोई भी महिला अपने बचपन के सपनों में यह नहीं देखती कि वह ऑटो चलाएगी। उसके सपनों में तो सम्मान, सुरक्षा, शिक्षा और सुकून भरा जीवन होता है। ऑटो की स्टीयरिंग उसके हाथों में किसी चाह से नहीं, शायद हालात की सख़्ती से आई होगी। यह उसकी मंज़िल नहीं, उसकी लड़ाई का रास्ता रहा होगा।
लेकिन उसी दृश्य में एक गहरी खुशी भी छुपी थी। खुशी इस बात की कि स्त्री जब सबसे कठिन मोड़ पर खड़ी होती है, तब वह टूटती नहीं—वह और मजबूत हो जाती है। समाज जिन कामों को “मर्दों का काम” कहकर सीमाएँ खींच देता है, वहीं स्त्री अपनी ज़रूरत, ज़िम्मेदारी और आत्मसम्मान के साथ उतर जाती है। वह ऑटो सिर्फ सवारी नहीं ढो रहा था, वह एक औरत की हिम्मत, उसका संघर्ष और उसका स्वाभिमान लेकर चल रहा था।
असल में दुख इस बात का नहीं कि वह ऑटो चला रही थी, दुख इस बात का है कि उसे वहाँ तक आना पड़ा। और खुशी इस बात की है कि वहाँ आकर भी वह हारी नहीं।
स्त्री की मजबूरी पर मत तरस खाओ,
वहीं से उसकी असली ताकत जन्म लेती है
जहाँ सपने टूटते हैं, वहीं से संघर्ष चल पड़ता है।
यह दृश्य समाज से एक सवाल भी पूछता है
क्या हम स्त्रियों को विकल्प दे रहे हैं,
या सिर्फ उनकी मजबूरी पर ताली बजाकर आगे बढ़ जा रहे हैं?



























