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कब मैं बड़ा हो गया – माँ

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मोहन पलिया, फ़िरोज़ाबाद उत्तर प्रदेश

माँ
कुछ कहे बिना हि वो मेरी,
हर बात जान जाती है।
मेरी माँ अपनी खुशी की,
वजह मुझे बताती है।
तकलीफ में मेरी वो अपना,
पूरा फ़र्ज़ निभाती है।
मेरी माँ अपना दर्द
मुस्कुराकर छिपा जाती है।
सीधा कहती है, भोला कहती है
मैं इतना बड़ा हो गया,
पर मेरी माँ मुझे
आज भी बच्चा कहती है।
यूँ तो हर कोई
बुलंदियों को छू लेता है,
मगर छूकर माँ के पैरों को
एक बेटा आसमान को छू लेता है।
रेंगते- रेंगते घुटनों से
ना जाने कब,
मैं अपने पैरों पर खड़ा हो गया।
माँ तेरी ममता की छाँव में
पता ही नहीं चला
कब मैं बड़ा हो गया।