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देवभूमि : महासू देवता (महाशिव)

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यूं ही उत्तराखंड को देवभूमि नहीं कहां जाता, यहां के कण-कण में भगवान विराजमान हैं। आज हम बात करेंगे महासू देवता यानि महाशिव जी की। महासू देवता (महाशिव) उत्तराखंड के जौनसार-बावर और हिमाचल प्रदेश के प्रमुख लोक देवता हैं, जो चार भाइयों—बासिक, पबासिक, बूठिया, और चालदा महासू के रूप में पूजे जाते हैं। किंवदंती के अनुसार, इन्होंने ‘किरमीर’ नामक राक्षस से क्षेत्र को मुक्त कराया था। हनोल स्थित इनका मुख्य मंदिर न्याय का केंद्र माना जाता है।

महासू देवता की पौराणिक कथा और मान्यताएँ 

एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब अग्निदेव, सूर्यदेव और कार्तिकेय ने हवन में गणेश जी को शामिल नहीं किया, तो क्रोधित होकर कार्तिकेय ने अपने मांस के चार टुकड़े कर समुद्र में फेंक दिए, जिनसे चार महासू भाइयों का जन्म हुआ। वही दूसरी कथा के अनुसार, किरमीर नामक राक्षस ने जौनसार क्षेत्र में त्राहि-त्राहि मचा दी थी। स्थानीय लोगों की पुकार पर, हूणा भाट (एक ब्राह्मण) की तपस्या से प्रसन्न होकर महासू देवता प्रकट हुए और उन्होंने राक्षस को पराजित कर क्षेत्र को शांति प्रदान की। महासू देवता को भगवान शिव का ही रूप माना जाता है।

 

न्याय का तरीका

यहां लोग अपनी समस्याएं लेकर आते हैं, और चावल के दानों के माध्यम से देवता की इच्छा/भविष्यवाणी का पता लगाया जाता है। वहीं हनोल (उत्तराखंड) में स्थित मंदिर पांडवों से भी संबंधित माना जाता है। यहाँ श्रद्धालु नारियल, बकरा (गांडवा-जिसे छोड़ा जाता है) और सोने/चांदी के छत्र चढ़ाते हैं। महासू देवता की पूजा में, विशेषकर चालदा महासू की, घुमंतू संस्कृति की झलक मिलती है, और उन्हें पहाड़ों का रक्षक माना जाता है।