मीना जोशी ‘मनु’
हल्द्वानी। लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस को समाज का संरक्षक माना जाता है। उसका दायित्व केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना ही नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना भी होता है। संविधान ने पुलिस को इसलिए शक्ति दी है ताकि वह अपराधियों पर अंकुश लगा सके और आमजन को भयमुक्त जीवन दे सके। किंतु जब यही शक्ति संवेदनशीलता खोकर अमानवीयता में बदल जाती है, तब पुलिस जनता की रक्षक न रहकर भय का दूसरा नाम बन जाती है। विशेष रूप से गरीब, कमजोर और सामाजिक रूप से वंचित वर्ग के लिए पुलिस कई बार न्याय का माध्यम न होकर शोषण का हथियार बन जाती है। यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
आज समाज में अनेक ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं, जहाँ पुलिस अपनी शक्ति का उपयोग न्याय के लिए नहीं, बल्कि दबाव, भय और आर्थिक लाभ के लिए करती दिखाई देती है। दुर्भाग्य यह है कि इस शोषण का सबसे आसान शिकार वही व्यक्ति बनता है, जो आर्थिक रूप से कमजोर हो, सामाजिक रूप से अकेला हो और कानूनी जानकारी से वंचित हो। जिन लोगों के पास प्रभाव, पहुँच या धन नहीं होता, वे अक्सर पुलिसिया व्यवस्था के सामने स्वयं को असहाय पाते हैं। कई बार चालान के नाम पर, पूछताछ के नाम पर, या अधूरी-अधूरी कानूनी जानकारी देकर उनसे धन वसूला जाता है। गरीब व्यक्ति अपनी बेगुनाही साबित करने से अधिक अपनी इज्जत बचाने में लग जाता है, क्योंकि उसे डर होता है कि यदि उसका नाम थाने या मुकदमे से जुड़ गया तो समाज उसे अपराधी की दृष्टि से देखने लगेगा।
पुलिस की इस मानसिकता का सबसे खतरनाक पक्ष यह है कि वह कमजोर को ही अपना मोहरा बनाती है। समाज का प्रभावशाली व्यक्ति कानून तोड़ भी दे तो उसके प्रति व्यवहार नरम रहता है, लेकिन वही गलती यदि किसी मजदूर, रिक्शाचालक, किसान या निम्नवर्गीय युवक से हो जाए तो उसके साथ अपराधी जैसा व्यवहार किया जाता है। यह दोहरा मापदंड केवल अन्याय नहीं, बल्कि व्यवस्था की नैतिक विफलता है। कानून सबके लिए समान होना चाहिए, किंतु व्यवहार में अक्सर कानून का बोझ उन्हीं लोगों पर अधिक पड़ता है जो अपना पक्ष रखने में सक्षम नहीं होते।
आर्थिक शोषण पुलिसिया अमानवीयता का एक बड़ा रूप बन चुका है। सड़क पर वाहन चेकिंग के दौरान कई बार नियमों का हवाला देकर गरीब व्यक्ति से ऐसे पैसे वसूले जाते हैं, जिनकी कोई आधिकारिक रसीद नहीं होती। भय का वातावरण ऐसा बनाया जाता है कि व्यक्ति स्वयं रिश्वत देकर मामला समाप्त करना चाहता है। कुछ स्थानों पर थानों में शिकायत दर्ज कराने के लिए भी गरीब व्यक्ति को अपमान और आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ता है। जिनके पास पैसे होते हैं, उनकी सुनवाई जल्दी होती है, जिनके पास नहीं होते, उनकी पीड़ा फाइलों में दब जाती है। इस प्रकार न्याय बिकाऊ प्रतीत होने लगता है और विश्वास टूटने लगता है।
मानसिक शोषण इससे भी अधिक घातक है। गरीब और कमजोर व्यक्ति को बार-बार थाने बुलाना, अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना, परिवार के सामने बेइज्जत करना और बिना ठोस आधार के अपराधी जैसा व्यवहार करना उसके आत्मसम्मान को भीतर से तोड़ देता है। समाज में बदनामी का भय उसे अंदर ही अंदर खा जाता है। कई बार व्यक्ति यह सोचने लगता है कि वह निर्दोष होकर भी अपराधी की तरह क्यों जी रहा है। ऐसी परिस्थितियों में मानसिक तनाव इतना बढ़ जाता है कि कुछ लोग आत्महत्या जैसा भयावह कदम उठाने तक मजबूर हो जाते हैं। यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की असफलता है जो नागरिक को सुरक्षा देने के लिए बनाई गई थी।
समाज में प्रतिदिन ऐसे अनेक मौन सत्य जन्म लेते हैं, जिनकी खबर सुर्खियाँ नहीं बनती। एक गरीब किसान पुलिस के डर से अपनी जमीन छोड़ देता है, एक मजदूर झूठे आरोप के भय से चुप रह जाता है, एक युवक सामाजिक अपमान के कारण जीवन समाप्त कर देता है। ये घटनाएँ केवल आँकड़े नहीं हैं; ये उस टूटते हुए सामाजिक विश्वास के संकेत हैं जहाँ नागरिक और पुलिस के बीच का रिश्ता भय और अविश्वास में बदल रहा है। जब जनता अपनी सुरक्षा करने वाली संस्था से ही डरने लगे, तब लोकतंत्र का आधार कमजोर होने लगता है।
इस समस्या की जड़ केवल व्यक्तिगत भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता भी है। पुलिस प्रशिक्षण में कानून की शिक्षा तो दी जाती है, लेकिन मानवीय संवेदना और सामाजिक न्याय की समझ कई बार कमजोर रह जाती है। शक्ति का अहंकार जब सेवा की भावना पर हावी हो जाता है, तब वर्दी सम्मान का प्रतीक न रहकर आतंक का प्रतीक बन जाती है। यह भी सच है कि सभी पुलिसकर्मी ऐसे नहीं होते। अनेक ईमानदार और संवेदनशील अधिकारी आज भी अपने कर्तव्य को मानवता के साथ निभा रहे हैं। किंतु कुछ लोगों के अमानवीय व्यवहार से पूरी संस्था की छवि धूमिल हो जाती है।
इस स्थिति को बदलने के लिए केवल आलोचना पर्याप्त नहीं है। सबसे पहले पुलिस व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। प्रत्येक शिकायत की स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। गरीब व्यक्ति को कानूनी सहायता सुलभ होनी चाहिए ताकि वह अपने अधिकारों को समझ सके। थानों को भय का केंद्र नहीं, भरोसे का स्थान बनाना होगा। पुलिस प्रशिक्षण में संवेदनशीलता, मानवाधिकार और संवाद कौशल को अनिवार्य रूप से शामिल करना चाहिए। साथ ही, समाज को भी यह समझना होगा कि किसी व्यक्ति पर आरोप लगना ही अपराध सिद्ध होना नहीं है। सामाजिक कलंक की मानसिकता भी कई बार पुलिसिया शोषण को अप्रत्यक्ष शक्ति देती है।
मीडिया और नागरिक समाज की भूमिका भी यहाँ महत्वपूर्ण है। जब तक ऐसे मामलों को खुलकर सामने नहीं लाया जाएगा, तब तक पीड़ित की आवाज दबती रहेगी। सोशल मीडिया के इस दौर में कई सच सामने आने लगे हैं, लेकिन अभी भी हजारों लोग चुपचाप अन्याय सहते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि जनता कानून से डरे नहीं, बल्कि कानून पर विश्वास करे। और यह विश्वास तभी बनेगा जब कानून लागू करने वाली संस्था अपने आचरण में न्याय और मानवता दोनों का परिचय दे।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि किसी भी राष्ट्र की सभ्यता केवल उसके कानूनों से नहीं, बल्कि उन कानूनों को लागू करने के तरीके से आँकी जाती है। यदि पुलिस गरीब और कमजोर को ही अपना मोहरा बनाकर अत्याचार और पैसों की दोहरी मार करती रहेगी, तो न्याय का अर्थ खो जाएगा। एक लोकतांत्रिक समाज में वर्दी की असली गरिमा शक्ति प्रदर्शन में नहीं, बल्कि कमजोर के आँसू पोंछने में है। जिस दिन पुलिस यह समझ लेगी कि उसका सबसे बड़ा कर्तव्य भय नहीं, विश्वास पैदा करना है, उसी दिन समाज में न्याय का वास्तविक अर्थ पुनः स्थापित हो सकेगा।



























