ललिता कापड़ी
जिस धरती को हम देवभूमि कहते आए हैं, जहाँ कण-कण में शिव का वास माना गया, आज उसी धरती पर मनुष्यता कराहती दिख रही है। शहरों से लेकर कस्बों तक, हर दिन बलात्कार, हत्या, अपहरण जैसी घटनाओं की खबरें आत्मा को झकझोर देती हैं। विशेष पीड़ा तब होती है जब यह सब उत्तराखंड जैसी शांत, आध्यात्मिक पहचान वाली भूमि में बढ़ता दिखाई देता है।
महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, यह आत्ममंथन की रात्रि है। शिव वह चेतना हैं जो विनाश के माध्यम से सृजन का मार्ग खोलती है। पर प्रश्न यह है कि आज हम किसका विनाश कर रहे हैं? क्या हम अपनी संवेदनाएँ, अपना विवेक, और अपनी सामाजिक जिम्मेदारियाँ तो नहीं मिटा रहे? आज अपराध केवल कानून की समस्या नहीं रह गए, यह समाज की सामूहिक चूक का परिणाम हैं। परिवार, शिक्षा, राजनीति और व्यवस्था—सब कहीं न कहीं मौन साधे हुए हैं। जब स्त्री असुरक्षित है, बच्चा भय में जी रहा है और आम नागरिक न्याय की उम्मीद छोड़ने लगे, तब यह केवल अपराध की नहीं, मूल्यों के पतन की सूचना होती है।
शिव का तांडव अराजकता नहीं, संतुलन का प्रतीक है। शिव का क्रोध अन्याय के विरुद्ध है, और उनका ध्यान करुणा की पराकाष्ठा। महाशिवरात्रि हमें यही स्मरण कराती है कि यदि समाज में अंधकार बढ़ रहा है, तो दीप जलाने की जिम्मेदारी भी हमारी ही है। हम केवल सोशल मीडिया पर शोक व्यक्त कर चुप न बैठें, बल्कि अपने घर, मोहल्ले और सोच से बदलाव की शुरुआत करें।
देवभूमि को सचमुच देवभूमि बनाए रखने के लिए मंदिरों में घंटियाँ बजाना पर्याप्त नहीं, बल्कि मन के मंदिर में न्याय, समानता और संवेदना को प्रतिष्ठित करना होगा। जब तक हम अपराध को “किसी और की समस्या” मानते रहेंगे, तब तक यह हर दरवाज़े तक पहुँचेगा।























