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मीडिया के शोर मै दम तोड़ते जनमुद्दे

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जिस मीडिया के अवतरण का मूल उद्देश्य ही मज़लूमों की आवाज़ बनना और जनमुद्दों को बेबाकी से उठाना रहा हो, यदि वही मीडिया अपने बुनियादी सरोकारों को भूलकर रेटिंग और व्यूज़ की अंधी दौड़ में शामिल हो जाए, तो जनहित के मुद्दों का हाशिए पर जाना स्वाभाविक हो जाता है। यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है, जब बात उत्तराखंड जैसे विषम परिस्थितियों वाले प्रदेश की हो—जहाँ बेरोज़गारी, लगातार पलायन से खाली होते पहाड़ और महिला सुरक्षा जैसे गंभीर सवाल मुंह बाए खड़े हैं। डिजिटल मीडिया की तेज़ रफ्तार में ट्रेंडिंग खबरें पल-पल बदल रही हैं, लेकिन उत्तराखंड के पहाड़ों से उठती सिसकिया लगातार अनसुनी रह जाती है। यह सच्चाई है बढ़ती बेरोज़गारी, गहराता पलायन और वीरान होते गांव की बेरोज़गारी पहाड़ का ऐसा कड़वा सच है जिसका मुद्दा राज्य गठन के बाद भी सुलझ नहीं पाया आंकड़े दर्शाते है कि उत्तराखंड में बेरोज़गारी दर 8.9 प्रतिशत है, जो देश में सब से अधिक है। सरकार द्वारा जब तब प्रदेश में बेरोज़गारी में कमी आने के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन सरकारी सर्वेक्षणों और ज़मीनी हकीकत के बीच का अंतर लगातार सवाल खड़े करता नजर आता है। राज्य गठन के 25 साल बाद भी उत्तराखंड का एक बड़ा वर्ग रोज़गार की तलाश में अपने ही घरों से दूर जाने को मजबूर है। पहाड़ी जिलों के सैकड़ों गांव या तो पूरी तरह खाली हो चुके हैं या फिर बुज़ुर्गों के सहारे किसी तरह जीवित हैं। युवा दिल्ली, देहरादून, हल्द्वानी और अन्य शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं।उत्तराखंड में हरिद्वार और देहरादून जैसे मैदानी जिलों में औद्योगिक और सेवा क्षेत्र के अवसर मौजूद हैं, वहीं रुद्रप्रयाग, पौड़ी और अन्य पहाड़ी जिलों में प्रति व्यक्ति आय, विकास दर और रोजगार के अवसर बेहद सीमित हैं। यही असमानता पलायन को मजबूर करती है।इसके अलावा सरकारी आंकड़े और सामाजिक संगठनों की रिपोर्टें बताती हैं कि रोज़गार के स्थायी अवसरों की कमी, स्थानीय संसाधनों का समुचित उपयोग न होना और नीति निर्माण में जमीनी हकीकत की अनदेखी इस संकट की मुख्य वजह हैं। खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है, छोटे उद्योग दम तोड़ रहे हैं और पर्यटन जैसी संभावनाएं भी सीमित हाथों तक सिमटकर रह गई हैं।
उत्तराखंड को 15वें वित्त आयोग में आपदा प्रबंधन फंड का बढ़ा हुआ हिस्सा मिलना इस बात का संकेत है कि राज्य को अब स्थायी जोखिम क्षेत्र माना जाने लगा है। इसके साथ ही 7,375 वन सीमा स्तंभों का गायब होना केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, प्रशासनिक उदासीनता और जवाबदेही की कमी का गंभीर संकेत है।इसी के साथ दुखद यह भी है कि डिजिटल मीडिया में उत्तराखंड की पहचान अक्सर प्राकृतिक आपदाओं, चारधाम यात्रा या पर्यटन तक सीमित कर दी जाती है।नतीजा पहाड़ के भीतर चल रही यह खामोश त्रासदी—पलायन, बेरोज़गारी और सामाजिक विघटन शायद ही कभी स्थायी बहस का विषय बन पाती है।जब मीडिया इन ज्वलंत सवालों पर चुप रहता है, तो उसकी कार्यशैली खुद सवालों के घेरे में आ जाती है। क्या विकास सिर्फ शहरों तक सीमित रहेगा? क्या पहाड़ केवल तस्वीरों और पोस्टरों में ही सुंदर रहेंगे? दूसरी तरफ राज्य मै महिला उत्पीड़न की बढ़ती घटनाएं राज्य मै धूमिल होती कानून व्यवस्था की ओर इशारा करती है। अंकिता भंडारी हत्याकांड जैसे मामले यह भी दिखाते हैं कि महिला सुरक्षा केवल कानून का नहीं, बल्कि शासन और सामाजिक संवेदनशीलता का सवाल है। इस प्रकरण में आजीवन कारावास की सज़ा के बावजूद, निष्पक्ष जांच और जवाबदेही को लेकर उठे सवाल जनता के भरोसे को कमजोर करते हैं।अब समय आ गया है कि डिजिटल मीडिया क्लिक और रेटिंग की दौड़ से बाहर निकलकर उत्तराखंड की असल समस्याओं को प्राथमिकता दे। पलायन और बेरोज़गारी कोई सामान्य खबर नहीं, बल्कि प्रदेश के भविष्य से जुड़ा सवाल है। क्या मीडिया और सरकार, दोनों मिलकर पहाड़ की असली पीड़ा सुनेंगे, या डिजिटल शोर में यह सच्चाई यूं ही दबती रहेगी?