Home उत्तराखंड सिलेंडर पर सियासत या सिस्टम की साजिश?

सिलेंडर पर सियासत या सिस्टम की साजिश?

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हल्द्वानी । उत्तराखंड के हल्द्वानी समेत कई इलाकों से इस वक्त एक ही तस्वीर सामने आ रही है रसोई गैस का संकट। लेकिन सवाल ये है कि क्या वाकई गैस की कमी है या फिर सिस्टम की नाकामी ने हालात बिगाड़ दिए हैं? जहां एक तरफ गोदी मीडिया देश में गैस सप्लाई सामान्य होने का दावा कर रहे हैं, वहीं जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। उपभोक्ता गैस बुक कर रहे हैं, लेकिन हफ्तों तक सिलेंडर नहीं मिल रहा। आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है
प्रशासन का दावा है कि हर घर तक गैस पहुंचाई जा रही है, लेकिन क्या कभी ये जांच हुई कि असल में सिलेंडर किन लोगों तक पहुंच रहा है? सूत्रों की मानें तो गैस एजेंसियां और उनसे जुड़े ठेकेदार बुकिंग वाले ग्राहकों को नजरअंदाज कर रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल जब इंडेन जैसी कंपनियां बुकिंग के हिसाब से गैस उपलब्ध करा रही हैं, तो आखिर सिलेंडर जा कहां रहे हैं?
हल्द्वानी में कामर्शियल गैस सिलेंडर पर रोक है। छोटे होटल, ढाबे और कारोबार बंद होने की कगार पर हैं। कई तो अपना काम समेट चुके हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि कुछ ढाबों पर पिछले 20–23 दिनों से लगातार सिलेंडर इस्तेमाल हो रहा है। क्या ये साफ तौर पर कालाबाजारी नहीं है? और अगर है, तो सप्लाई कौन कर रहा है। क्यों कि बिना एजेंसी की मिलीभगत के ये संभव नहीं हैं।

गैस किल्लत के चलते शहर के कैटरिंग व्यवसायी शीन कैटर्स, रॉयल कैटर्स, डीपी नानक और स्टैंडर्ड स्वीट का काम प्रभावित हुआ हैं। सिर्फ 20% गैस सप्लाई मिलने से कारोबार ठप पड़ गया है। इस संबंध में व्यवसायियों ने सिटी मजिस्ट्रेट से गुहार लगाई, लेकिन अब तक राहत नहीं मिल पाई है। दूसरी तरफ घरों में चूल्हे की आच भी ठंडी पड़ती जा रही हैं। गैस किल्लत के चलते लोगों मै गुस्सा है और वे गैस एजेंसियों के दफ्तर पहुंच रहे है हल्द्वानी, रुद्रपुर, लालकुआं और बिंदुखत्ता में हर जगह हालात गंभीर हैं। होम डिलीवरी ठप है, लोग एजेंसियों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन जवाब मिलता है स्टॉक नहीं है।

हजारों परिवारों की रसोई पर संकट गहराता जा रहा है। गैस एजेंसियों को घर-घर डिलीवरी की जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन अब वही एजेंसियां ठेकेदारों के जरिए काम करवा रही हैं।यानी जिम्मेदारी से साफ पल्ला झाड़ लिया गया है और इसका खामियाजा भुगत रहा है आम उपभोक्ता। यहां सवाल यह है कि किसी भी खामी पर जवाबदेही कौन तय करेगा।एजेंसीसरकारी हो या प्राइवेट एजेंसी में अगर गड़बड़ी हो रही है तो जांच कौन करेगा? कौन रोकेगा इस कथित कालाबाजारी को? कुल मिलाकर एक तरफ जनता गैस के लिए परेशान है,और दूसरी तरफ सरकार जश्न में व्यस्त नजर आ रही है। ऐसे में सवाल यह भी है क्या ये गैस संकट है या सिस्टम की साजिश? क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी? और सबसे बड़ा सवाल—क्या आम आदमी को उसका हक मिलेगा? सवाल तमाम है लेकिन सवालों का जवाब जिनके पास है वे खामोश बैठे हैं।