Home उत्तराखंड तो क्या इन होनहारों का राज्य में नहीं कोई खेवनहार ?

तो क्या इन होनहारों का राज्य में नहीं कोई खेवनहार ?

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देहरादून । जहां एक ओर धामी सरकार ने 100 से अधिक भाजपा कार्यकर्ताओं को दायित्वों से नवाजा है और उपनल कर्मियों के मामले में हाईकोर्ट के निर्देश के बाद भी ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई है, वहीं प्रदेश के बीपीएड/एमपीएड प्रशिक्षित बेरोजगारों के प्रति सरकार का रवैया संवेदनहीन बना हुआ है। 4 जून से शिक्षा निदेशालय, ननुरखेड़ा में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे इन प्रशिक्षितों का आरोप है कि दो हफ्ते से अधिक समय बीतने के बाद भी शासन और प्रशासन ने उनकी सुध नहीं ली। मांगें पूरी न होने पर प्रदर्शनकारियों ने आत्मघाती कदम उठाने की चेतावनी दी है।

प्रदेश अध्यक्ष जगदीश चंद्र पांडे के नेतृत्व में धरना दे रहे प्रशिक्षितों की मांग है कि नई शिक्षा नीति 2020 के तहत प्रत्येक प्राथमिक से इंटरमीडिएट विद्यालय में एक शारीरिक शिक्षक अनिवार्य रूप से नियुक्त किया जाए। इसके साथ ही उच्च प्राथमिक विद्यालयों में व्यायाम शिक्षक की फाइल संख्या 77006 को वित्त विभाग से मंजूरी दिलाकर कैबिनेट में पास करने, बीपीएड/एमपीएड प्रशिक्षितों को आयु सीमा में छूट देने और शारीरिक शिक्षा का प्रवक्ता पद सृजित कर नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने की मांग प्रमुख है। इस दौरान धरने में महेश नेगी, किशन खत्री, सुमन नेगी, खुशहाल कोरंगा, संजय कोरंगा, अनूप तिवारी, देवेंद्र कुकरेती समेत कई प्रशिक्षित मौजूद रहे।

यूकेडी के वरिष्ठ नेता काशी सिंह ऐरी ने बीपीएड/एमपीएड प्रशिक्षित बेरोजगारों को अपना समर्थन देने के साथ ही कहा कि सत्ता में आने पर गेस्ट टीचरों को प्राथमिकता से नियमित किया जाएगा, स्कूलों की व्यवस्था सुधारी जाएगी और बंद स्कूलों को फिर से खोला जाएगा। ऐरी ने कहा कि किसी भी क्षेत्र का विकास शिक्षा व्यवस्था के इर्द गिर्द ही घूमता है। पहाड़ से पलायन की बड़ी वजह कमजोर शिक्षा व्यवस्था है जिससे गांव के गांव खाली हो रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तराखंड में बारी बारी से सत्ता में रही भाजपा और कांग्रेस यह समझने में असफल रही हैं कि गांवों के विकास के बिना प्रदेश का विकास संभव नहीं है। इन दलों ने उत्तराखंड राज्य की भोली भाली जनता के सीधेपन का लाभ उठाकर सिर्फ अपना व्यक्तिगत विकास किया है।

उत्तराखंड क्रांति दल के युवा नेता सीए वरूण चन्दोला ने बीपीएड /एमपीएड प्रशिक्षित बेरोजगारों के धरने को समर्थन देते हुए कहा कि उत्तराखंड राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन पहाड़ का आम आदमी आज भी बुनियादी सवालों से जूझ रहा है। किसी भी क्षेत्र का विकास उस क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर करता है। अफसोस है कि इन 25 वर्षों में राष्ट्रीय दलों ने पहाड़ और मैदान के नाम पर सिर्फ और सिर्फ यहां की जनता को गुमराह किया। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे विषयों को हल करने के बजाय इन्हें जन-आंदोलनों का मुद्दा बना दिया गया। आज सरकारी स्कूलों में न भवन हैं, न शिक्षक, न लैब। अस्पतालों में डॉक्टर नहीं, युवाओं के हाथ में रोजगार नहीं। पलायन रुकने के बजाय बढ़ता जा रहा है।
उन्होने कहा कि उत्तराखंड क्रांति दल सत्ता में आते ही एक समान शिक्षा प्रणाली लागू करेगी, शिक्षा के बाजारीकरण पर रोक लगाएगी, पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप कृषि, बागवानी, पशुपालन, कुटीर उद्योग और पर्यटन की अलग नीति बनाएगी, 70% स्थानीय युवाओं को रोजगार का शासनादेश सख्ती से लागू करवाएगी।
उन्होंने बताया कि जब तक पहाड़ के स्कूल-अस्पताल नहीं सुधरेंगे, जब तक यहां के नौजवान को अपने गांव में ही काम नहीं मिलेगा, तब तक ‘उत्तराखंड राज्य’ का सपना अधूरा रहेगा।