भाजपा-कांग्रेस के ‘म्यूजिकल चेयर’ से हताश कार्यकर्ता, पहाड़ में बजा UKD का राग
उत्तराखंड में सड़क पर ‘यू-टर्न’ से एक्सीडेंट होता है, और सियासत में ‘यू-टर्न’ से कार्यकर्ता का करियर। भाजपा-कांग्रेस के बड़े नेताओं की “अपनी ढपली, अपना राग” वाली राजनीति ने जमीनी सिपाही को चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। सवाल एक ही है- जब सेनापति को ही समझ न आए कि इधर जाएं या उधर, तो फौज किसके भरोसे लड़े? जवाब पहाड़ की जनता 2027 में देने को तैयार बैठी है, “बहुत हुआ दल-बदल, अबकी बार दिल्ली चल।”
हल्द्वानी। उत्तराखंड के पहाड़ी रास्तों पर ‘यू-टर्न’ खतरनाक माने जाते हैं, लेकिन भाजपा-कांग्रेस की सियासत में नेताओं के ‘यू-टर्न’ और ‘फ्री-स्टाइल’ कलाबाजियों ने ऐसा रायता फैला दिया है कि जमीनी कार्यकर्ता सिर पकड़कर बैठ गया है। हालत ये है कि ऊपर बैठे नेताओं का “अपनी ढपली, अपना राग” बज रहा है, और नीचे दरी बिछाने वाला कार्यकर्ता सुबह-शाम नारे बदलने को मजबूर है। डर ये कि कहीं ‘इधर चला मैं उधर चला’ वाला बैकग्राउंड म्यूजिक न बजने लगे। हालात ये हैं कि जनता दरबार तो लग रहे हैं लेकिन जनसुनवाई कहीं भी नजर नहीं आ रही। हर कोई न्यायालय का रूख करने को मजबूर हो रहा है। कुछ जगहों पर तो जनसुनवाई ही जनसमस्याओं को जन्म देने लगी है। ‘बहरहाल इतना ही कहा जा सकता है कि उत्तराखंड के लोग मुख्यमंत्री से लेकर हर विभाग को अपनी शिकायतें दर्ज तो कर रहे हैं परन्तु शिकायत ही अपने आप में शिकायत बन जा रही है।‘ उत्तराखंड सीएम पोर्टल ही इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन गया।
खैर बहरहाल कांग्रेस-भाजपा में लोकतंत्र ‘ओवरफ्लो’ हो रहा है। जितने बड़े नेता, उतने गुट, उतनी टीमें और अपने सुर-ताल। एक गुट देहरादून में प्रेस कॉन्फ्रेंस करता है तो दूसरा उसी वक्त कुमाऊं में अपनी चौपाल चमकाता है। संगठन की बैठकें कम, ‘पावर प्रोजेक्शन’ ज्यादा। दिल्ली से प्रभारी आता है तो एकता की कसम खाई जाती है, लेकिन जौलीग्रांट से उड़ान भरते ही सब अपनी-अपनी ढपली निकाल लेते हैं।
कार्यकर्ता पूछता है, “साहब, हम किसके पीछे चलें? एक के पाले में जाओ तो दूसरा नाराज, दूसरे के पास बैठो तो तीसरा टिकट काटने की धमकी देता है। हमारी तो हालत ‘एक अनार, सौ बीमार’ जैसी है।”
आजकल नेताओं की निष्ठा मौसम की तरह बदल रही है। ‘कमल’ की खुशबू पर कई दिग्गज कब ‘भगवा’ चोला पहन लें, खुद उनके करीबियों को पता नहीं। वहीं कमल की खुशबू से तंग आकर कब कोई हाथ का साथ थाम ले, कहना मुश्किल
कल तक जिस नेता के लिए कार्यकर्ता ने लाठियां खाईं, सोशल मीडिया पर ‘ट्रोल-वॉर’ लड़ा, सुबह खबर आती है कि ‘माननीय’ ने पाला बदल लिया। अब बेचारा कार्यकर्ता पुरानी पोस्ट डिलीट करने में लगा है। समझ नहीं पाता कि कल जिसे ‘भ्रष्टाचारी’ कहा, आज उसे ‘विकास पुरुष’ कैसे लिखे।
इस दल-बदल और उधेड़बुन से तंग कार्यकर्ता अब तीसरे विकल्प यानी उत्तराखंड क्रांति दल की ओर रुख कर रहे हैं। 25 साल में भाजपा-कांग्रेस ने पहाड़ को क्या दिया, ये सब जान चुके हैं।
कल तक जिस UKD के पास उम्मीदवार नहीं होते थे, आज एक-एक विधानसभा में 4-5 दावेदार लाइन में हैं। कहीं-कहीं आंकड़ा 9-10 तक पहुंच गया है। बूथ मजबूत हो रहे हैं। 2027 विधानसभा चुनाव परिवर्तन का युग बन सकता है।
भाजपा ‘पन्ना प्रमुख’ और ‘बूथ मैनेजमेंट’ की मिलिट्री ट्रेनिंग में व्यस्त है, वहीं कांग्रेस के सिपहसालार मंच पर आगे बैठने और गाड़ी में बड़ी फोटो की लड़ाई लड़ रहे हैं। पहाड़ का युवा खुद को ठगा महसूस कर रहा है। उसे समझ आ गया कि लड़ाई विचारधारा की नहीं, अपने-अपने ‘सेफ एग्जिट’ रूट की है।
2027 में उत्तराखंड की जनता ऐसा ‘राग’ बजा सकती है जिससे राष्ट्रीय दलों को अगली बार ढपली बजाने के लिए कोरस भी न मिले। तभी उत्तराखंड का विकास संभव है। राष्ट्रीय दल हमेशा दिल्ली के आदेश पर चलते रहे, इसीलिए आज भी उत्तराखंड अपनी संस्कृति बचाने में जुटा है।
UKD का सत्ता में आना उत्तराखंड के सुनहरे कल का पहला चरण होगा। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पलायन पर धरातल पर काम दिखेगा और पूर्ववर्ती सरकारों के भ्रष्टाचार की पोल भी खुलेगी।































