ललिता, हल्द्वानी उत्तराखंड
“पिता तो परमेश्वर ही होता है”, ऐसा सुनते ही वह फूट-फूट कर रोने लगी। हज़ारों बार पूछा कि क्या हो गया, पर कुछ न बोली। मानो मुँह से शब्द बाहर आते-आते भीतर ही रह जाते हों। ऐसा पहली बार नहीं था। जब-जब उसके सामने पिता का होना भाग्यशाली कहा जाता, उसके चेहरे पर अजीब-सी उदासी और आँखों में नमी होती। ऐसा प्रतीत होता था कि उसके जीवन में पिता के न होने का उसे गहन दुःख है, जिसे वह बर्दाश्त नहीं कर पा रही।
एक दिन जब वह इसी तरह रोने लगी, तो प्यार से उसे पास बैठाकर सहलाया। उसका हाथ अपने हाथ में लिया और पूछा, “कितने बरस हो गए तुम्हारे पिता को गए हुए?” वह बोली, “पिता जीवित हैं।” बस इतना ही बोली, फिर चुप हो गई। मैंने कहा, “तो उनसे मिलकर आ जाओ, कुछ दिन उनके पास रह लो।” वह सन्न थी। बस आँखों से आँसू बहे जा रहे थे। उसे गले लगाकर पूछा, “क्या कारण है? क्या कोई तुम्हें उनके पास जाने से रोकता है?” फिर वह कुछ कहते-कहते रुक गई।
आज मैंने भी पक्का इरादा किया था कि उसके मन की वह बात जाननी ही है, जो वह कहते-कहते रुक जाती है और उसके शब्द उसकी आँखों से बहते हैं। मैंने कहा, “देखो, पिता तो पिता होता है। कुछ कह दिया हो तो कोई बात नहीं। पिता जो भी करते हैं, हमारी भलाई के लिए ही करते हैं। पिता कभी अपनी संतान का बुरा नहीं चाहता। उनकी बातों को दिल से नहीं लगाया करते। तुम समय निकालो, अपने पिता के पास जाओ, थोड़ा-सा मुस्कुराओ। देखो, वह तुम्हें कैसे गले लगाएंगे।”
उसने पूछा, “क्या पिता सच में इतने अच्छे होते हैं? आज अख़बारों में, फ़ेसबुक पर लोगों को पिता दिवस मनाते देखा, तो मन में यही सवाल बार-बार कौंधता है, क्या पिता सच में इतने अच्छे होते हैं?”
मैंने कहा, “देखो, पिता तो परमात्मा होता है। आजीवन केवल अपने परिवार और बच्चों के लिए संघर्ष करता है, समर्पण करता है। वह दो जोड़ी कपड़ों में पूरा महीना गुज़ारकर भी अपने बच्चों की सभी ज़रूरतें पूरी करता है। यदि वह दो-चार शब्द बोल भी दे, तो बुरा मानकर उनसे दूर नहीं हुआ जाता।”
उसने पूछा, “यदि कोई पिता उसके बचपन से लेकर उसकी शादी तक उसे अपनी हवस का शिकार बनाता हो, तो भी क्या उसे परमात्मा ही कहा जाएगा? उसे जन्म देने वाला पुरुष जब उसे अपनी शारीरिक आवश्यकताओं के लिए प्रयोग करता हो, क्या तब भी उसे परमात्मा ही कहा जाएगा?”
इतना कहकर वह फूट-फूट कर रोने लगी। इतना रोई, इतना रोई कि रोते-रोते सो गई।
अब मेरे पास इस बात का कोई उत्तर नहीं था। उसे देखकर मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। मेरे हाथ-पैर काँप रहे थे। मैं यह सोच रही थी कि यह हर दिन इस विचार के साथ कैसे जी पाती होगी। मैं जानती थी कि एक बेटी के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग कर पाना आसान नहीं होता। क्योंकि यह समाज हर परिस्थिति में केवल स्त्री जाति का ही तिरस्कार करता है। न जाने ऐसी कितनी ही कहानियाँ कितनी ही स्त्रियों के सीने में दफ़्न होंगी। वे भीतर से रोकर बाहर से मुस्कुरा रही होंगी।
अंततः मन में ख़याल आया, शायद इस तरह से पिता दिवस मनाने पर इस तरह के पिताओं की प्रजाति समाप्त हो सके।
पुरुष का पिता होना और पिता से परमेश्वर की उपाधि मिल जाना भी एक पुरुष के लिए तपस्या से कम नहीं।































