नेहा खत्री, जयपुर
पिता महज़ एक रिश्ता नहीं, पूरे परिवार की बुनियाद हैं। वे उस घने वृक्ष जैसे होते हैं जिसकी छाँव में पूरा घर महफूज़ रहता है। ज़िम्मेदारियों का बोझ कंधों पर उठाकर भी वे अपनी थकान और संघर्ष बच्चों तक नहीं पहुँचने देते।
पिता का प्रेम अक्सर खामोश होता है। वह डाँट में छिपी फिक्र, सुबह जल्दी उठकर काम पर जाने, और बच्चों की फीस के लिए खुद की ज़रूरतें टाल देने में दिखता है। वे सपनों को पंख देने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं और हर मुश्किल का सामना मुस्कुराकर करते हैं।
जब ज़िंदगी की राहें डगमगाती हैं, पिता का हाथ सबसे मज़बूत सहारा बनता है। उनके तजुर्बे रास्ता दिखाते हैं और उनका आशीर्वाद हौसला देता है। अपने सुख भूलकर वे परिवार की खुशियों को ही प्राथमिकता बनाते हैं।
घर में पिता की मौजूदगी एक रौशनी की तरह है। उनसे ही घर में भरोसा, सुरक्षा और अपनापन कायम रहता है। बच्चों के लिए पिता का साया जन्नत के नूर जैसा है — जहाँ प्यार, संरक्षण और संस्कार तीनों मिलते हैं।
सच है, इस दुनिया में पिता की जगह कोई नहीं ले सकता। वे परिवार की ताकत, आधार और पहचान हैं। उनके त्याग और समर्पण के आगे हर शब्द छोटा पड़ जाता है। पिता का साया ही ज़िंदगी की सबसे बड़ी दौलत है।































