उत्तराखंड को अस्तित्व में आए पच्चीस वर्ष हो गये हैं। इस दौरान राज्य ने अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन एक प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना राज्य गठन के समय था,क्या उत्तराखंड अपनी आर्थिक क्षमता का पूरा उपयोग कर पा रहा है? क्या राज्य की आय बढ़ाने और आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में पर्याप्त प्रयास किए जा रहे हैं? यह प्रश्न केवल सरकार का नहीं, बल्कि उन जनप्रतिनिधियों का भी है जिन्हें जनता ने विकास की जिम्मेदारी सौंपी है। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि केवल कानून बनाने या योजनाओं का उद्घाटन करने के लिए नहीं चुने जाते। उनसे अपेक्षा होती है कि वे अपने क्षेत्र और राज्य के भविष्य की दिशा तय करें। दुर्भाग्य से राजनीति का एक बड़ा हिस्सा आज विकास के दीर्घकालिक एजेंडे के बजाय व्यक्तिगत और राजनीतिक हितों के इर्द-गिर्द सिमटता दिखाई देता है। जब सोच केवल अपने कार्यकाल, अपने परिवार या अपनी आने वाली पीढ़ियों की आर्थिक सुरक्षा तक सीमित हो जाए, तब राज्य हित पीछे छूट जाता है। ऐसी मानसिकता किसी भी प्रदेश के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। उत्तराखंड के पास प्राकृतिक संसाधनों का विशाल भंडार है। धार्मिक और आध्यात्मिक पर्यटन की विश्वस्तरीय पहचान है। जल विद्युत उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। जैविक कृषि, औषधीय पौधे, बागवानी, वन संपदा और साहसिक पर्यटन जैसे अनेक क्षेत्र राज्य की आय बढ़ाने के मजबूत आधार बन सकते हैं। फिर भी राज्य का बड़ा हिस्सा आज भी केंद्रीय सहायता और सीमित राजस्व स्रोतों पर निर्भर है। यह स्थिति बताती है कि संभावनाओं और उपलब्धियों के बीच अभी भी बड़ा अंतर मौजूद है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि विकास को केवल निर्माण कार्यों और घोषणाओं तक सीमित न रखा जाए। राज्य को ऐसे आर्थिक मॉडल की आवश्यकता है जो रोजगार पैदा करे, पलायन रोके और स्थानीय लोगों की आय बढ़ाए। पहाड़ के गांव तभी बसेंगे जब वहां आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी। युवाओं को तभी अवसर मिलेंगे जब निवेश आएगा, स्थानीय उत्पादों को बाजार मिलेगा और पर्यटन का लाभ गांवों तक पहुंचेगा।जनप्रतिनिधियों को विधानसभा और स्थानीय निकायों में इस बात पर गंभीर चर्चा करनी चाहिए कि अगले दस वर्षों में उत्तराखंड की आय दोगुनी या तिगुनी कैसे हो सकती है। राज्य के संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग कैसे हो, राजस्व के नए स्रोत कैसे विकसित किए जाएं और सरकारी खर्चों में पारदर्शिता तथा जवाबदेही कैसे सुनिश्चित हो,ये विषय राजनीतिक बहस के केंद्र में होने चाहिए। आज आवश्यकता राजनीति में दूरदृष्टि की है। जनता ऐसे नेतृत्व की अपेक्षा करती है जो केवल वर्तमान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के बारे में भी सोच सके। अपने पुस्तों तक कमाई की मानसिकता अंततः समाज और राज्य दोनों को कमजोर करती है, जबकि राज्य की आय बढ़ाने और समग्र विकास की सोच लाखों परिवारों का भविष्य बदल सकती है। उत्तराखंड का भविष्य कुछ लोगों की संपन्नता से नहीं, बल्कि पूरे राज्य की आर्थिक मजबूती से सुरक्षित होगा। यही समय है जब जनप्रतिनिधि व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर राज्य की आर्थिक समृद्धि को अपना सर्वोच्च लक्ष्य बनाएं। क्योंकि मजबूत अर्थव्यवस्था ही मजबूत उत्तराखंड की सबसे बड़ी पहचान बन सकती है।
लेखक सुरेश चंद्र पाठक ‘पर्वत प्रेरणा’ के संपादक और पर्वतीय पत्रकार महासंघ उत्तराखंड के अध्यक्ष हैं।
(लेखक के अपने विचार )

























