तबादलों का सिलसिला, जनता का इंतजार
बागेश्वर । 1997 में अलग जिला बनने के बाद से बागेश्वर को अब तक 22 जिलाधिकारी मिल चुके हैं। यानी औसतन हर 1.3 साल में एक नया डीएम और यह आंकड़ा अकेले बयां करता है कि यहां प्रशासनिक स्थिरता कितनी नसीब होती है। ताजा उदाहरण सामने है सीडीओ से पदोन्नत होकर डीएम बनीं आईएएस अधिकारी को महज सात महीने में सचिवालय भेज दिया गया। सूत्रों के मुताबिक जिले में अनुशासन की डोज देने और लेटलतीफी पर सख्ती बरतने की कोशिश ही उनके लिए मुश्किल बन गई। एक अहम विभाग के अधिकारी की लापरवाही पर कार्रवाई की भनक जैसे ही जिले के कद्दावर जनप्रतिनिधि के संरक्षण तक पहुंची, टकराव गहरा गया और तबादला सबसे आसान हथियार साबित हुआ।
कलेक्टरी को आईएएस के लिए जनता से सीधे जुड़ाव और त्वरित फैसलों का सबसे असरदार मंच माना जाता है। लेकिन सात महीने में एक डीएम को फील्ड से हटाकर सचिवालय भेजना प्रशासनिक भाषा में ‘ठंडी पोस्टिंग’ से कम नहीं। सवाल सीधा है – क्या सात महीने में कोई अधिकारी किसी जिले की भौगोलिक, सामाजिक और प्रशासनिक बारीकियों को समझकर बड़ा बदलाव ला सकता है? जवाब साफ है – नहीं। बार-बार होने वाले ऐसे तबादलों का खामियाजा विकास योजनाओं की निरंतरता और फील्ड में काम कर रहे ईमानदार अधिकारियों के मनोबल को उठाना पड़ता है। व्यवस्था में गलत संदेश जाता है कि काम की कसौटी परफॉर्मेंस नहीं, पॉलिटिकल ट्यूनिंग है।
1997 से 2025 तक 22 डीएम का मतलब है कि बागेश्वर की जनता को शायद ही कभी किसी डीएम के साथ लंबा प्रशासनिक रिश्ता निभाने का मौका मिला हो। हर नए चेहरे के साथ प्राथमिकताएं बदलती हैं, अधूरी योजनाएं फाइलों में दब जाती हैं और जनता फिर से नए सिरे से अपनी उम्मीदें गिनाने लगती है। इस पूरे घटनाक्रम में न राजनेताओं की जीत है, न ब्यूरोक्रेसी की हार। नुकसान सिर्फ उस जनता का है जो स्थायी और मजबूत प्रशासनिक नेतृत्व की आस लगाए बैठी है। बागेश्वर ने सात महीने की वह पारी भी देखी जो रफ्तार पकड़ने से पहले ही सियासत की भेंट चढ़ गई। अब निगाहें नए डीएम पर हैं क्या वह इस प्रशासनिक बिसात पर राजनीतिक दबाव और प्रशासनिक कर्तव्य के बीच संतुलन साध पाएंगे, या बागेश्वर को फिर से तबादलों का नया अध्याय लिखना पड़ेगा।





























