पेपर लीक से शुरू हुआ आंदोलन अब चारों स्तंभों से सवाल पूछ रहा है
जंतर-मंतर पर पिछले कुछ दिनों से जो भीड़ जमा हो रही है, वह सिर्फ़ एक पेपर लीक का विरोध नहीं है। आज़ादी के बाद का यह सबसे बड़ा युवा आंदोलन बन चुका है, जिसका एक ही सवाल है – जवाबदेही किसकी? 12 साल से केंद्र में सत्तारूढ़ सरकार के कार्यकाल में भ्रष्टाचार बढ़ा, महंगाई चरम पर पहुंची, रोजगार और शिक्षा की स्थिति लगातार बिगड़ी। लेकिन हर संकट के बाद एक ही दृश्य दिखा। ज़िम्मेदारी तय करने के बजाय सभी ने कंधे उचका दिए। युवाओं ने इसी खालीपन को भरा है।

चारों स्तंभ कटघरे में
आंदोलनकारियों का कहना है कि लोकतंत्र के चार स्तंभ आज अपनी मूल भूमिका से दूर हो गए हैं।
विधायिका: जिसका काम नीति बनाना और जनता के सवाल उठाना था, वह अब विधायकों और सांसदों की खरीद-फरोख्त की चर्चाओं में घिर गई है।
कार्यपालिका: जिसका दायित्व सेवा देना था, वह दिशा भटक गई। दो दिन में बनी सड़क तीसरे दिन गायब हो जाए तो सवाल उठना लाज़मी है।
न्यायपालिका: सुनवाई टालना, मामलों को खारिज कर देना आम हो गया है। पीड़ित दरवाज़ा खटखटाता रह जाता है।
पत्रकारिता: सच दिखाने की जगह झूठ और फरेब की परतों के पीछे धन अर्जन का खेल चल रहा है।
इसीलिए जंतर-मंतर पर लगा हर पोस्टर, हर नारा अब पेपर लीक से आगे निकलकर भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महिला अपराध, महंगाई और सरकारी संपत्तियों की बिक्री तक पहुंच गया है।

सड़क से संसद तक
आंदोलन की ताकत इस बात में है कि यह किसी एक दल या मुद्दे तक सीमित नहीं रहा। मंदिरों में आस्था के नाम पर लूट, लाभ में चल रहे सरकारी संस्थानों का निजीकरण, शिक्षा और स्वास्थ्य का बदहाल ढांचा, ये सभी मुद्दे एक सूत्र में बंध गए हैं। वह सूत्र है जवाबदेही। एक प्रदर्शनकारी ने कहा, “हमें 2047 का विकसित भारत का सपना बाद में चाहिए। पहले आज का भारत सुरक्षित चाहिए। आज पेपर लीक हो रहा है, कल नौकरी नहीं मिलेगी, परसों इलाज के पैसे नहीं होंगे। तो हम किस भविष्य की बात करें?”
सत्ता के गलियारे में हलचल
एनडीए 240 के बहुमत के साथ सरकार चला रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर सत्ताधारी दल के आधे सांसद भी जनता के इस सवाल पर गंभीर हो जाएं, तो सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। सरकार भी इसे समझती है, तभी जवाब देने के बजाय मुद्दे को घुमाने की कोशिश हो रही है। लेकिन युवा पीछे हटने को तैयार नहीं। उनका तर्क साफ है। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, सड़कों पर उतरना बंद नहीं होगा।
आखिरी सवाल
जंतर-मंतर से उठ रही मांग बहुत बड़ी नहीं है। बस इतनी है कि जिसने गलती की, वह माने। जिस विभाग की लापरवाही है, वह ज़िम्मेदारी ले। 2047 बहुत दूर है। तब तक कई चेहरे बदल जाएंगे। कई लोग इस दुनिया को अलविदा कह जाएंगे। सवाल यह है कि तब तक हम अपने आज को कितना सुरक्षित रख पाते हैं।

फिलहाल देश के नौजवान एक ही लाइन दोहरा रहे हैं। पेपर लीक का मामला छोटा नहीं था। यह उस बड़ी बीमारी का लक्षण था जिसका नाम है जवाबदेही का अभाव और जब तक इस बीमारी का इलाज नहीं होगा, जंतर-मंतर खाली नहीं होगा।































