युवा बेरोजगार, मंहगाई चरम पर और पढ़े-लिखे को ‘पप्पू’ कहने की रीत
देहरादून/नई दिल्ली : केंद्र और राज्यों में भाजपा सरकार के कार्यकाल में बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार की नीतियों से सरकारी संस्थानों का तेजी से निजीकरण हुआ और सरकारी नौकरियों के रास्ते बंद हो गए। पहले की सरकारें धरातल पर रोजगार योजनाएं लाती थीं। अब आत्मनिर्भर भारत के नारे के साथ रेलवे, एयरपोर्ट, बैंक, कोयला क्षेत्र और बड़े भू-राजस्व तक निजी हाथों में सौंपे जा रहे हैं। इससे सरकारी सेवाएं महंगी हुईं और युवाओं के लिए नौकरी के अवसर घटे। 2026 में पेट्रोलियम खपत पर संकट के बीच जनता से तेल बचाने की अपील की जा रही है, जबकि स्वयं की विदेश यात्राओं पर रोक नहीं। सवाल उठ रहा है कि जब युवा पहले से बेरोजगारी झेल रहे हैं, तो महंगाई से कैसे लड़ेंगे।

भाजपा नेता और कार्यकर्ता पढ़े-लिखे सवाल उठाने वाले लोगों को ‘पप्पू’ कहकर संबोधित करते हैं। वहीं नेताओं और सरकारी कर्मचारियों के वेतन-भत्ते लगातार बढ़ रहे हैं। देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड में पलायन सबसे बड़ा दर्द है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल, अस्पताल, पानी की कमी है, पर जंगली जानवरों का आतंक बढ़ा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के अपने गांव में भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है।
आरोप है कि मुख्यमंत्री राहत कोष से भाजपा कार्यकर्ताओं को लाभ पहुंचाया गया, मीडिया मैनेजमेंट और हवाई यात्राओं पर करोड़ों खर्च हुए। मंत्रीगण अधिकांश कांग्रेसी पृष्ठभूमि से हैं और दल-बदल की राजनीति में व्यस्त हैं। राज्य में भ्रष्टाचार को ‘धाकड़, धुरंधर, दामाद’ जैसी पहेलियों से जोड़ा जा रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि उत्तराखंड के पानी, वनस्पति और संस्कृति में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं, पर सरकार की कथनी और करनी में अंतर है।

सरकार ये नहीं बता पा रही कि महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार चरम पर क्यों हैं? आम नागरिक पूछ रहा है कि आत्मनिर्भरता के पाठ के अलावा उसे मिला क्या?
“धर्म की लड़ाई: वोट की राजनीति या आस्था का सवाल”
पिछले एक दशक में देश में ‘धर्म’ चुनावी और सामाजिक बहस का सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है। मंदिर-मस्जिद विवाद, यूसीसी, धर्मांतरण कानून और त्योहारों पर सियासत ने आम आदमी की रोजमर्रा की परेशानियों जैसे महंगाई, बेरोजगारी, स्वास्थ्य को पीछे कर दिया है। 2014 के बाद से धार्मिक पहचान पर वोट मांगना आम हो गया है। एक तरफ भाजपा ‘हिंदुत्व, राम मंदिर, काशी-मथुरा’ की बात करती है, तो दूसरी तरफ विपक्ष ‘संविधान बचाओ, अल्पसंख्यक अधिकार’ का मुद्दा उठाता है।कई राज्यों में लव जिहाद कानून, धर्मांतरण विरोधी बिल, गोहत्या कानून लाए गए। असम में यूसीसी पास हुआ। इन पर एक पक्ष इसे ‘संस्कृति की रक्षा’ बताता है, दूसरा पक्ष ‘निजी स्वतंत्रता पर हमला’ कहता है।
कर्नाटक में हिजाब विवाद, हरियाणा में नूंह हिंसा, उत्तराखंड में लैंड जिहाद-मजार तोड़ने की कार्रवाई, उत्तर प्रदेश में कांवड़ रूट पर दुकानों के नेमप्लेट विवाद हर साल नए मुद्दे सुर्खियों में आते हैं। WhatsApp फॉरवर्ड, रील्स और टीवी डिबेट से धार्मिक मुद्दे गांव-गांव पहुंच गए। ‘पढ़े-लिखे को पप्पू’ और ‘पार्टी विरोधी’ या ‘अन्य दल’ जैसे टैग इसी लड़ाई की देन हैं।

देवभूमि में भी ‘धर्म की लड़ाई’ तेज है। मुख्यमंत्री धामी सरकार ने ‘लैंड जिहाद’ के नाम पर हजारों मजारें हटाने का दावा किया। समान नागरिक संहिता लागू करने वाला उत्तराखंड पहला राज्य बना। विरोधी इसे ‘मूल मुद्दों से ध्यान भटकाना’ कहते हैं उनका आरोप है कि पलायन, अस्पताल, स्कूल की जगह मंदिर-मस्जिद पर बहस हो रही है। धर्म के नाम पर बने माहौल से रोजगार कितने बढ़े? महंगाई कितनी घटी? नेताओं की रैलियों में भीड़ बढ़ी, टीवी की टीआरपी बढ़ी, पर गांव में पानी पहुंचा क्या? अब सवाल यही है कि उत्तराखंड राज्य में 2027 के चुनाव तक धर्म सबसे बड़ा मुद्दा रहेगा या रोटी-कपड़ा-मकान वापस आएंगे?



























