देहरादून। उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव से डेढ़ साल पहले भाजपा के अंदरूनी समीकरणों पर मंथन तेज हो गया है। पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं से लेकर इंटरनल सर्वे तक, दो मुद्दे सबसे ऊपर हैं टिकट वितरण और कैडर की नाराजगी।
पार्टी के कर्मठ कार्यकर्ताओं का कहना है कि मेहनत कोई और करे, मलाई कोई और खाए”। पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच ये शिकायत सबसे ज्यादा सुनने में आ रही है। 2017 और 2022 में कई सीटों पर पुराने नेताओं का टिकट काटकर नए चेहरों को मौका दिया गया। कुछ जगह ये प्रयोग चला, पर कई सीटों पर 20 साल से बूथ संभालने वाले कार्यकर्ता किनारे कर दिए गए। आरोप है कि संगठन से लेकर बोर्ड-निगम तक, 2019-22 में दूसरी पार्टी से आए नेताओं और उनके करीबियों का दबदबा बढ़ा है। जिसका परिणाम 2022 में 5-6 सीटें सिर्फ बूथ मैनेजमेंट कमजोर होने से गईं, ऐसा जमीनी विश्लेषण है।
इंटरनल सर्वे का संकेत भी यही कहते हैं एंटी-इनकंबेंसी दोगुनी हुई है। सूत्रों के अनुसार हाल के दो इंटरनल सर्वे में सामने आया कि नाराजगी सिर्फ सरकार के खिलाफ नहीं, लोकल विधायक के खिलाफ भी है। उत्तराखंड जैसी छोटी सीटों में विधायक का चेहरा 15-20% वोट तय करता है। 2017 में 10 सीटें 2000 वोट से कम के मार्जिन से तय हुई थीं। ऐसे में अगर 5-7 सीटों पर नाराज नेता निर्दलीय उतरे या भीतरघात हुआ, तो 70 में से 36 का बहुमत का गणित बिगड़ सकता है।
इस समय कुमाऊं में ज्यादा बेचैनी है। जमीनी चर्चा में कुमाऊं की नाराजगी गढ़वाल से ज्यादा बताई जा रही है। आर. एस. एस. बैकग्राउंड वाले कार्यकर्ता सबसे ज्यादा मुखर हैं। उनका कहना है कि मंडल अध्यक्ष से लेकर दायित्वों तक, पुराने कार्यकर्ता लिस्ट से गायब हैं। भाजपा का जवाब है कि “विनेबिलिटी” ही आधार है। केंद्रीय नेतृत्व ने 2027 के लिए लाइन साफ की है। भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और राजनाथ सिंह कह चुके हैं कि चुनाव मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। पार्टी ने “विनेबिलिटी” को टिकट का एकमात्र पैमाना बताया है, जिससे बैठे हुए एम.एल.ए. में बेचैनी है।

सरकार के सामने पलायन, शिक्षा-स्वास्थ्य, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे हैं साथ ही विपक्ष राहत कोष के खर्च और केंद्रीय नेताओं के दौरे पर खर्च को मुद्दा बना रहा है। वहीं भाजपा यू.सी.सी., नकल विरोधी कानून और विकास को अपनी उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है। वहीं उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भी बार-बार बड़े-बड़े मंचों से कहते रहते हैं कि उत्तराखंड के अधिकारी बेलगाम है। 2022 में धामी खुद खटीमा हार गए थे, फिर उन्हे चम्पावत से चुनाव लड़ाया गया, 2027 में ये लक्जरी शायद न मिले। भाजपा की ताकत उसका कैडर रहा है। अगर वही कैडर बूथ पर कमजोर पड़ा, तो मोदी फैक्टर अकेला चुनाव नहीं निकाल पाएगा। अगले 6 महीने में टिकट कटने और पुराने नेताओं की एडजस्टमेंट से तस्वीर साफ होगी। ये रिपोर्ट पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच चल रही चर्चा और मीडिया में आई केंद्रीय नेताओं की टिप्पणियों पर आधारित है। आधिकारिक टिकट सूची और सर्वे रिपोर्ट पार्टी द्वारा सार्वजनिक नहीं की गई है।


























