तड़ागताल के भविष्य पर मंडराता खतरा
लेखक: पर्यावरण प्रेमी शंकर सिंह बिष्ट
चौखुटिया। चौखुटिया क्षेत्र में स्थित तड़ागताल केवल एक झील नहीं, बल्कि पूरे इलाके की पारिस्थितिकी, जल व्यवस्था और आजीविका का आधार है। इस झील को जीवन देने वाली दो मुख्य धाराएं (गधेरे) हैं—पहली “पारागाड़”, जो सुपताल और बिन्सर दीपकोट के जलागम क्षेत्र से आती है, और दूसरी “खडगडी गाड़”, जो पांडवखोली और गर्जिया की ओर से निकलती है। ये दोनों धाराएं तड़ागताल झील के मुहाने पर मिलती हैं और उसे अस्तित्व प्रदान करती हैं। इसके बाद यही जल तड़ाग नदी के रूप में लगभग 5 से 6 किलोमीटर बहता हुआ रामगंगा नदी में समाहित हो जाता है, जो रामगंगा की प्रमुख सहायक नदियों में से एक है।
लेकिन आज स्थिति बेहद चिंताजनक हो चुकी है। वर्तमान समय में दोनों गधेरों की हालत दयनीय है और “खडगडी गाड़” पूरी तरह सूख चुकी है, जो तड़ागताल के भविष्य को लेकर एक बड़ी चिंता और शंका पैदा करती है। खडगडी गाड़ के कैचमेंट क्षेत्र की बात करें तो इसे पांडवखोली, कुकुछिना की उत्तरी ढाल, जड़ों की ओर के जंगल, गर्जिया क्षेत्र तथा मनसा देवी के आसपास के वन जीवन प्रदान करते रहे हैं। ये क्षेत्र कभी बाज, बुरांश, काफल और अय्यार जैसे मध्य हिमालयी मिश्रित वनों से आच्छादित थे, जो इस धारा को निरंतर जल उपलब्ध कराते थे।
खडगडी गाड़ केवल एक जलधारा नहीं थी, बल्कि आसपास के गांवों—गर्जिया, पैली, अखोड़िया, नौगांव बेड़िया और गाड़तोईया—की जीवनरेखा थी। ये गांव पेयजल, सिंचाई और पशुपालन के लिए पूरी तरह इसी नदी पर निर्भर थे। कभी इस गधेरे में इतना पानी था कि लगभग 10 घराट यानी पनचक्कियां संचालित होती थीं, जो आज खंडहर में बदल चुकी हैं। लोग अपने पशुओं और जंगल से लाए गए लकड़ी-घास के उपयोग के लिए रस्सी बनाने हेतु भीमल के डंडों को इस गधेरे में दो से तीन महीने तक भिगोते थे और फिर उनसे रेशे निकालते थे। यहां तक कि इस गधेरे में अच्छी मात्रा में मछलियां भी पाई जाती थीं, जो आसपास के लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण गतिविधि और संसाधन हुआ करती थीं।
दूसरी ओर, यदि हाल के वर्षों पर नजर डालें तो इस क्षेत्र का लूरिया वॉटरफॉल भी काफी प्रसिद्ध और चर्चित रहा है, लेकिन अब उसके अस्तित्व पर भी खतरा मंडराने लगा है। स्थानीय स्रोतों के अनुसार, लगभग 2012-13 के बाद इस गधेरे के जलस्तर में धीरे-धीरे गिरावट शुरू हुई और समय के साथ यह स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि आज यह नदी पूरी तरह सूख चुकी है और केवल एक बरसाती गधेरे के रूप में रह गई है।
खडगडी गाड़ के सूखने का सीधा असर तड़ागताल झील पर पड़ रहा है। इस झील को पूरे चौखुटिया क्षेत्र में पर्यटन के रूप में विकसित कर विकास का आधार माना जा रहा है, लेकिन अब इसके अस्तित्व और भविष्य पर खतरा खड़ा हो चुका है। इस परिवर्तन का प्रभाव केवल जल स्रोत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका व्यापक असर मानव समुदाय, उसकी आर्थिकी, पेयजल व्यवस्था, स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र और माइक्रो क्लाइमेट पर भी देखने को मिल रहा है, जो आने वाले समय में और अधिक भयावह रूप ले सकता है।
यदि इस गधेरे के सूखने के कारणों पर नजर डालें तो इसमें वैश्विक कारणों के साथ-साथ स्थानीय स्तर के गंभीर कारण भी शामिल हैं। इस क्षेत्र के अधिकांश जंगल रिजर्व फॉरेस्ट के अंतर्गत आते हैं और पिछले कई दशकों से लगातार लगने वाली फॉरेस्ट फायर ने यहां के माइक्रो इकोसिस्टम को बुरी तरह प्रभावित किया है। आग लगने से घास, मॉस और वे सभी पादप नष्ट हो गए हैं, जो जल को भूमि के भीतर पहुंचाने और नमी बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। इसके परिणामस्वरूप जल का भूमिगत संचय रुक गया है, जो इस नदी के सूखने का एक प्रमुख कारण बन गया है। इसके अतिरिक्त तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन जैसे कारक भी इस स्थिति को और गंभीर बना रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस गंभीर स्थिति की ओर न तो समाज का अपेक्षित ध्यान गया है और न ही उन जिम्मेदार विभागों का, जिनकी मुख्य जिम्मेदारी इन जंगलों और जल स्रोतों का संरक्षण करना है। एक ओर हम तड़ागताल के सुनहरे भविष्य और पर्यटन विकास के सपने देख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उसके जलागम क्षेत्र की पूरी तरह अनदेखी कर रहे हैं।

खडगडी गाड़ का सूखना केवल एक नदी की मौत नहीं है, बल्कि यह एक पूरे पारिस्थितिक तंत्र के संकट का संकेत है। यदि समय रहते जलागम क्षेत्रों के संरक्षण, वनों के पुनर्जीवन और जल स्रोतों के प्रबंधन पर गंभीरता से काम नहीं किया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब तड़ागताल का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा। अब यह हम सभी के सामने एक बड़ा प्रश्न है कि क्या हम इस चेतावनी को समझेंगे या फिर एक और जल स्रोत को इतिहास बनते हुए देखते रहेंगे।



























