“समाज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह चरित्र का मूल्यांकन कर्मों से कम और अफवाहों से ज्यादा करता है। सच्चाई जानने की फुर्सत किसी को नहीं, बदनामी सुनने का समय सबके पास है।”
बीते 25 वर्षों में उत्तराखंड की राजनीति में यही फॉर्मूला सबसे ज्यादा चला और इसका सबसे ताजा उदाहरण बागेश्वर जिले की कपकोट विधानसभा है।
25 साल, तीन बड़े नाम, एक जैसा हाल
उत्तराखंड बने 25 साल हो गए। इसी कपकोट की धरती ने राज्य को पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व राज्यपाल और पद्म भूषण से सम्मानित नेता दिया। नाम बड़ा है, पहचान बड़ी है। लेकिन सवाल यह है कि जिस क्षेत्र ने राज्य और केंद्र को इतने बड़े पद दिए, उस क्षेत्र का विकास कहां है?
धरातल पर जवाब साफ है। कपकोट आज भी राज्य की सबसे पिछड़ी विधानसभाओं में गिनी जाती है। यहां सड़कें मौसम के साथ टूटती हैं, स्कूल शिक्षक के इंतजार में रहते हैं, अस्पताल रेफर सेंटर बनकर रह गए हैं और नौजवान रोजगार की तलाश में पहाड़ छोड़कर मैदान की ओर जा रहे हैं।
“नेटवर्क का जाल” और असलियत का सन्नाटा
हाल ही में क्षेत्र के विधायक ने बयान दिया कि कपकोट में मोबाइल नेटवर्क का जाल बिछ चुका है। सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन जब गांव-गांव जाकर देखा जाए तो तस्वीर बदल जाती है।

कई गांवों में आज भी लोग एक बार फोन करने के लिए पहाड़ी की चोटी पर चढ़ते हैं। “कहीं एक लाइन सिग्नल मिल जाए” यही रोज का संघर्ष है। शहरों में बच्चे 5G पर ऑनलाइन क्लास कर रहे हैं, और यहां नेटवर्क की खोज के लिए पहाड़ चढ़ना पड़ रहा है।
कहने को विकास 5G की स्पीड से हो रहा है, पर दिख रहा है शून्य बैंड।
शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार: तीनों जगह पलायन
पिछले पांच वर्षों में कपकोट में मूलभूत सुविधाओं का हाल सबसे ज्यादा खटका है।
- शिक्षा: सरकारी स्कूलों में स्टाफ की कमी है। मजबूरन अभिभावकों को राष्ट्रीय दलों से जुड़े निजी स्कूलों में भारी फीस देकर बच्चों को भेजना पड़ रहा है।
- स्वास्थ्य: प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र संसाधनों के बिना हैं। गंभीर मरीज को बागेश्वर या हल्द्वानी रेफर करना आम बात है।
- रोजगार: स्थानीय स्तर पर कोई बड़ा उद्योग नहीं। नतीजा पलायन। गांव खाली हो रहे हैं, खेत बंजर।
जब पेट की आग और बच्चों के भविष्य का सवाल हो, तो विकास की परिभाषा बदल जाती है।
विकास या ‘विकास’?
इस बीच एक चीज तेजी से बढ़ी है, गांव-गांव में शराब की दुकानें। कानून कहता है कि शराब की दुकान के आवंटन से पहले स्थानीय लोगों की सहमति जरूरी है। असहमति पर टेंडर निरस्त होना चाहिए। लेकिन कपकोट में लगता है “कानून” की परिभाषा अलग है। यहां राष्ट्रीय दलों का फैसला ही अंतिम कानून है। बाकी छोटे-बड़े कार्यकर्ताओं को खुश रखा जाए। जनता शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के लिए भले तरसती रहे।
सवाल जो अनुत्तरित हैं
बीते 25 वर्षों में जो भी दल सत्ता में आया, उसने अपने और अपने समर्थकों का विकास जरूर किया। लेकिन कपकोट के हजारों सवाल आज भी वैसे ही हैं। राज्य पर बढ़ता कर्ज, गांवों का पलायन, पहचान का संकट। इन सबका बोझ अंत में आम आदमी को ही भरना है। कहावत है “खाया पिया कुछ नहीं, गिलास तोड़ा बारह आना।”
अब जरूरत किस बात की है
कपकोट को भाषण नहीं, बैंडविड्थ चाहिए। फीता काटने की फोटो नहीं, फर्स्ट एड वाला अस्पताल चाहिए। उद्घाटन नहीं, स्कूल में शिक्षक चाहिए। जब तक राजनीति अफवाह और नारों पर चलेगी, तब तक पहाड़ का सच यही रहेगा, नेता का घर चमकेगा, गांव अंधेरे में रहेगा। उत्तराखंड को आत्मनिर्भर गांव चाहिए, पलायन के आंकड़े नहीं। कपकोट इस राज्य का आइना है। अगर इस आइने को साफ नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां भी सिर्फ “कहीं सिग्नल मिल जाए” की उम्मीद में पहाड़ चढ़ती रह जाएंगी। ऐसा नजारा सिर्फ कपकोट विधानसभा में ही देखने को नहीं मिलता अपितु उत्तराखंड राज्य के लगभग लगभग सभी गांवों का यही हाल है।





























