Home उत्तराखंड जनता ने नकारा, पार्टी ने निखारा?

जनता ने नकारा, पार्टी ने निखारा?

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5 साल बेमिसाल या तुलना? उत्तराखंड पूछ रहा है – जनता की मांग के विपरीत काम, या विकास का नया मॉडल? स्थिरता मिली, पर सवाल भी साथ

तुलना अतीत से, चिंता वर्तमान की – 1792 गांव वीरान, सिडकुल संकट में, पहाड़ो से शिक्षा का भी हुआ पलायन

देहरादून। उत्तराखंड में 4 जुलाई को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार के 5 साल पूरे हुए। एनडी तिवारी के बाद वे राज्य के दूसरे और भाजपा के पहले मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने लगातार 5 साल का कार्यकाल पूरा किया। सरकार इसे “स्थिर नेतृत्व और नई कार्यसंस्कृति” बता रही है। लेकिन इसी बीच सोशल मीडिया से लेकर सियासी गलियारों तक एक सवाल गूंज रहा है – प्रचार नहीं, जवाब चाहिए। बीस साल पुरानी सरकारों से तुलना कब तक? आपकों बता दें कि खटीमा से विधानसभा चुनाव हारने के बाद, पार्टी हाईकमान (दिल्ली में बैठे नेतृत्व) ने चम्पावत विधानसभा में उपचुनाव कराकर एक बार फिर पुष्कर सिंह धामी को उत्तराखंड राज्य का मुख्यमंत्री बनाया। जिस उपचुनाव का व्यय भी सम्भवतः राज्य सरकार द्वारा ही वहन किया गया होगा, जिसका व्यय भार भी उत्तराखंड राज्य की आमजनता की जेब पर ही पड़ा।

अतीत का सहारा या वर्तमान का रिपोर्ट कार्ड?

आलोचकों का कहना है कि जिन सरकारों से आज तुलना की जा रही है, उनके पास आज जैसा बहुमत कभी नहीं था।
“तिवारी जी के समय सिडकुल बना, एचएमटी चला, शिक्षा-स्वास्थ्य का विस्तार हुआ। आज मजबूत बहुमत के बाद भी उपलब्धियां गिनाने के लिए अतीत का सहारा लेना पड़ रहा है”।सरकार का पक्ष है कि यूसीसी लागू करना, नकल विरोधी कानून, भू-कानून में संशोधन और निवेश को बढ़ावा देना जैसी पहलें राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहीं।

25 साल में जाति भारी, विकास पीछे

राज्य गठन को 25 साल हो गए, पर मूल मकसद अधूरा है। आरोप है कि भाजपा-कांग्रेस दोनों ने चुनाव में योग्यता से पहले जाति देखी। ठाकुर बाहुल्य में ठाकुर, ब्राह्मण बाहुल्य में ब्राह्मण।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सवर्ण पदों पर बदलाव से नाराज एक धड़ा मोदी सरकार के “वोकल फॉर लोकल” की बात पर यूकेेडी की तरफ झुक रहा है। यूजीसी का मामला कोर्ट में है और 2027 के चुनाव में यही मुद्दे बड़ा फैक्टर बन सकते हैं।

पलायन और रोजगार: दो तस्वीरें

सरकारी आंकड़े:

  • GSDP 20 महीने में 2.74 लाख करोड़ से 3.46 लाख करोड़
  • प्रति व्यक्ति आय 2.60 लाख, राष्ट्रीय औसत से 76 हजार ज्यादा
  • युवा बेरोजगारी 14.2% से घटकर 9.8%

ज़मीनी हकीकत:

  • 1792 गांव पूरी तरह वीरान।
  • सरकारी सम्पत्तियो पर निजीकरण को प्राथमिकता।
  • 2018-2022 में 28,531 लोगों का स्थायी पलायन, 3.07 लाख अस्थायी।
  • पंजीकृत बेरोजगार 5.14 लाख।
  • पंतनगर सिडकुल में PNG संकट से 50+ इकाइयां बंद। रोज 200-300 करोड़ का नुकसान।
  • ऊर्जा प्रदेश पर ऊर्जा संकट।
  • रोजगार के संसाधनों पर धरातल पर काम नहीं।
  • शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पलायन की स्थिति बदहाल।
  • इन पांच वर्षों में सबसे अधिक कर्ज में डूबा प्रदेश।
  • भ्रष्टाचार भी चरम पर।

यूकेेडी का एजेंडा

यूकेडी का कहना है कि राज्य बचाने के लिए अब मूल मुद्दों पर लौटना होगा। उनकी प्रमुख मांगें –

  • मूल निवास, सख्त भू-कानून, 15 साल वाला स्थाई निवास रद्द, यूजीसी रद्द।
  • गैरसैंण को स्थायी राजधानी।
  • मजबूत लोकायुक्त, भ्रष्टाचार पर कार्रवाई।
  • गांव-गांव रोजगार, स्वरोजगार के नए आयाम।
  • पर्यटन का प्रकृति आधारित विकास।
  • जल, जंगल, जमीन पर अधिकार।
  • उत्तराखण्ड की सम्पत्ति पर राज्य का अधिकार।
  • रोजगार पर मूल निवासियों का पहला अधिकार।

‘कुर्सी बचाओ’ से ‘काम दिखाओ’ तक

मुख्यमंत्री निवास को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। स्वामी से लेकर धामी तक हर सीएम ने वास्तु और पूजा-पाठ का सहारा लिया। हाल में डॉ. खंडूरी को राज्य मंत्री बनाकर जनसंख्या विश्लेषण समिति का उपाध्यक्ष बनाया गया है। समर्थक इसे आस्था मानते हैं, विरोधी इसे ध्यान भटकाने की राजनीति।

आगे क्या?

धामी सरकार ने स्थिरता दी है। इससे उनके अपनी निहितार्थ स्वार्थी योजनाओं को निरंतरता मिली। लेकिन बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा और पहाड़ की बुनियादी सुविधाएं अब भी बड़ी चुनौती हैं। जनता का मूड साफ है – अब विज्ञापन नहीं, परिणाम चाहिए। 2027 में वोट जाति पर पड़ेगा या विकास और काबिलियत पर, यह आने वाला समय बताएगा।

मांग थी समाधान, मिला प्रचार

आलोचकों का सीधा आरोप है कि सरकार बार-बार 20 साल पुरानी सरकारों से तुलना कर रही है। जबकि आज सरकार को जितना मजबूत बहुमत मिला है, उतना पहले कभी नहीं था। “स्व.तिवारी जी के समय बहुमत नहीं था, फिर भी सिडकुल, एचएमटी और शिक्षा-स्वास्थ्य का विस्तार हुआ। हालात ये हैं स्व.तिवारी के शासनकाल में हुए विकास कार्य भी धीरे-धीरे विलुप्त किए जा रहे हैं। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण डा. सुशीला तिवारी अस्पताल के रूप में देखने को मिल रहा है जहां डाक्टरों की कमी से अस्पताल अपनी छवि खोता जा रहा है। आज शिकायतों का समाधान नहीं हो रहा, शिकायतें ही बंद कर दी जा रही हैं या फिर सम्बन्धित अधिकारियों पर ही दोष मढ़ दिया जा रहा है।

सवाल सीधा है – उत्तराखंड को 15 साल के भाजपा शासन और 5 साल के स्थिर नेतृत्व के बाद वास्तव में क्या मिला। स्व.तिवारी के बिना बहुमत वाले काम, या आज के बहुमत के बाद भी अतीत का सहारा।