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पेट्रोल डालोगे या पानी

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शशि कुड़ियाल “चन्द्रभा”

देहरादून। ​यदि हम कहीं आग लगी देखते हैं, तो हमारा पहला विवेक क्या कहता है? स्वाभाविक रूप से यही कि उसमें पानी डाला जाए ताकि आग शांत हो सके। कोई भी समझदार व्यक्ति उसमें पेट्रोल या तेल डालने की मूर्खता नहीं करेगा। ​परंतु दुर्भाग्यवश, आज हमारा सोशल मीडिया नेटवर्क और उस पर सक्रिय समाज इसके ठीक विपरीत व्यवहार कर रहा है। हम आग बुझाने के बजाय, उसे और भड़काने का काम कर रहे हैं। किसी भी नकारात्मक घटना को इस कदर तूल दिया जाता है और वायरल किया जाता है, जिसकी कोई सीमा नहीं है। चंद व्यूज, लाइक्स, आर्थिक लाभ या फिर क्षणिक उन्माद में आ कर कुछ लोग यह भी नहीं सोच पाते कि इस नफरत के दूरगामी परिणाम कितने आत्मघाती होंगे। ​हाल ही में हरियाणा और उत्तराखंड के बीच सोशल मीडिया पर बढ़ता तनाव इसी गैर-जिम्मेदाराना डिजिटल व्यवहार का एक ज्वलंत उदाहरण है। महज एक यूट्यूबर के इस गैर-जिम्मेदाराना बयान से कि “यदि हरियाणा के लोग नहीं आएंगे, तो उत्तराखंड वाले भूखे मर जाएंगे”, क्या कोई सच बदल जाता है?

उत्तराखंड स्वाभिमानी है, इसके पास अपने पर्याप्त संसाधन हैं। भले ही हमें सीमित दायरे में गुजारा करना पड़े, किंतु देवभूमि का कोई भी व्यक्ति कभी भूखा नहीं मर सकता। दूसरी ओर, यदि हरियाणा के कुछ गिने-चुने लोगों ने अमर्यादित व्यवहार किया, तो उसके आधार पर पूरे राज्य को कटघरे में खड़ा कर देना कहां तक न्यायसंगत है? विडंबना यह है कि दोनों ही पक्षों के लोग सोशल मीडिया पर इस नफरत की आग में घी डालने की होड़ में लगे हैं। अब समय आ गया है कि इस उन्माद को तुरंत रोका जाए। कहीं ऐसा न हो कि यह मुद्दा गंभीर रूप ले ले। दोनों पड़ौसी राज्यों के बीच के इस वैमनस्य की कीमत कहीं दोनों ही राज्यों के निर्दोष और मासूम लोगों को न चुकानी पड़े।

यदि देश के विभिन्न राज्य ही आपस में इस तरह लड़ते रहे, तो फिर तो हो गई अखंड भारत की परिकल्पना साकार।
इतिहास गवाह है कि हमारी इसी आपसी फूट और संकीर्ण हरकतों के कारण हमें सहस्र वर्षों की गुलामी झेलनी पड़ी थी।
अफ़सोस कि इतिहास के उन काले पन्नों से भी हम कुछ सीख नहीं पाए। अभी कुछ ही दिनों पहले एक ग्राम प्रधान और एक बुजुर्ग व्यक्ति के स्थानीय विवाद को भी इंटरनेट पर इस कदर उछाला गया कि हमने अनजाने में अपने ही शांत और सांस्कृतिक उत्तराखंड की छवि को धूमिल कर दिया। आखिर हम हर संवेदनशील मुद्दे को नकारात्मक रंग देकर तमाशा बनाने पर क्यों आमादा हैं? अब बंद करो ये सब। आखिर हम कभी आत्ममंथन करेंगे या फिर यह गिरावट यूं ही जारी रहेगी?

​अब समय आ गया है कि हम सोशल मीडिया पर ‘लाइक, कमेंट या शेयर’ का बटन दबाने से पहले अपने नागरिक कर्तव्यों और सामाजिक जिम्मेदारी को समझें। नफरत और अफवाह फैलाने वाले कंटेंट को आगे बढ़ाने के बजाय, उसे अनदेखा करना और डिजिटल स्तर पर उसका बहिष्कार करना ही आज के समय की सच्ची देशभक्ति है। आइए, इस आभासी दुनिया में पेट्रोल बनने के बजाय पानी बनें, ताकि नफरत की हर आग को समय रहते बुझाया जा सके। यह सुधार किसी और से नहीं, बल्कि स्वयं हमसे शुरू होना चाहिए।

अपने बच्चों को हम विरासत में हर प्रकार का प्रदूषण दे रहे हैं, जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और साथ साथ बीमार दम तोड़ता प्राकृतिक संतुलन। अब कम से कम उन्हें हम भावनात्मक प्रदूषण तो न दें। उत्तराखंड में आने वाले अन्य राज्यों के अतिथियों से अपील है कि देवभूमि की मर्यादा बनाए रखें और हम देवभूमि वाले भी अपने इस “देवभूमि” उपनाम की गरिमा रखें।