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बचपन की यादों और बदलते दौर के बीच सजी ‘गर्मियों की छुट्टियों’ की काव्य संध्या

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सम्पर्क साहित्य संस्थान उत्तराखंड इकाई की ऑनलाइन गोष्ठी में बही स्मृतियों, संवेदनाओं और प्रकृति प्रेम की सरिता

सम्पर्क साहित्य संस्थान उत्तराखंड इकाई के तत्वावधान में 23 मई 2026 को “मैं और मेरी गर्मियों की छुट्टियां” विषय पर एक भावपूर्ण ऑनलाइन काव्य गोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता समन्वयक महासचिव रेनू शब्द मुखर ने की तथा मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार आशा शैली उपस्थित रहीं। मंच संचालन स्मिता शाह ने प्रभावशाली शैली में किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ उत्तराखंड प्रभारी ललिता द्वारा सभी अतिथियों के स्वागत एवं सरस्वती वंदना के साथ किया गया। इसके पश्चात सह सचिव शशि कुड़ियाल ने सम्पर्क साहित्य संस्थान का परिचय देते हुए संस्था की साहित्यिक एवं सामाजिक गतिविधियों पर प्रकाश डाला।

गोष्ठी में विभिन्न साहित्यकारों ने गर्मियों की छुट्टियों से जुड़ी यादों, बदलते परिवेश, गांव की मिट्टी, रिश्तों की मिठास और प्रकृति से जुड़ाव को अपनी रचनाओं में खूबसूरती से उकेरा।
डॉ. भगवती पनेरू ने बचपन की निश्छल छुट्टियों से लेकर आज के बदलते दौर तक की यात्रा को भावपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत किया। डॉ. गीता मिश्रा ‘गीत’ ने गर्मियों की छुट्टियों के खट्टे-मीठे अनुभवों को मनमोहक दोहों में पिरोया। वहीं सुधांशु शाह ने अपनी रचना “हाय-हाय गर्मी” के माध्यम से भीषण गर्मी का जीवंत चित्र खींचा।

नीतू डिमरी ने मायके और ससुराल में बिताई छुट्टियों की आत्मीय स्मृतियों को साझा किया, जबकि हेमा पंत ने बादलों से राहत की गुहार करती संवेदनशील रचना सुनाई। सीमा दीक्षित ने आधुनिक युग की बदलती गर्मियों की तस्वीर प्रस्तुत की तथा पुनिता सोनी ने गांव में बीती छुट्टियों को अपनी रचना में सजीव कर दिया।
कुमकुम माथुर ने अपनी रचना बेजुबान पशु-पक्षियों को समर्पित कर सभी को भावुक कर दिया। मुख्य अतिथि आशा शैली ने भी गर्मी के विविध पहलुओं पर अपनी काव्य सरिता बहाकर कार्यक्रम को गरिमा प्रदान की।

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में रेनू शब्द मुखर ने कहा कि आज गर्मी की छुट्टियों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। बच्चों में नानी-दादी के घर जाने की उत्सुकता कम होती जा रही है और वे प्रकृति से दूर होकर मोबाइल तक सीमित होते जा रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड इकाई की इस साहित्यिक पहल की सराहना करते हुए सभी प्रतिभागियों को शुभकामनाएं दीं।

अंत में उत्तराखंड प्रभारी ललिता ने अपनी कविता “आओ मिलकर बीज लगाएं” के माध्यम से सम्पर्क साहित्य संस्थान को और अधिक विस्तार देने का आग्रह किया तथा अपने ओजस्वी शब्दों के साथ कार्यक्रम का समापन किया। पूरी गोष्ठी आत्मीयता, साहित्यिक सौहार्द और पुरानी यादों की मधुर अनुभूतियों से सराबोर रही।