(ठुल बाग में करतार!)
उत्तराखंड के पहाड़ों में एक कहावत खूब मशहूर है— “नान बाग में ठुल बाग, ठुल बाग में करतार।” पहले इसका मतलब खेत-खलिहान और हैसियत से लगाया जाता था, लेकिन अब राजनीति ने इसका नया संस्करण जारी कर दिया है। आजकल नेताओं में एक नई बीमारी फैल गई है “आका अनुकरण सिंड्रोम”। जो जितना बड़ा नेता, उसके पीछे उतने ही बड़े नकलची। कोई अपने वरिष्ठ नेता जैसी टोपी पहन रहा है, कोई वैसी ही जैकेट सिलवा रहा है, तो कोई उसी अंदाज में हाथ हिलाकर जनता का अभिवादन कर रहा है। कुछ तो इतने समर्पित हैं कि मुस्कुराने और गुस्सा होने का समय भी अपने आकाओं से प्रेरणा लेकर तय करते हैं। पहले नेता जनता के बीच अपनी पहचान बनाते थे, अब पहचान बनाने का सबसे आसान तरीका है,अपने बड़े नेता की कार्बन कॉपी बन जाना। ऐसा लगता है जैसे राजनीति नहीं, बल्कि किसी नाटक मंडली का ऑडिशन चल रहा हो, जहां प्रतियोगिता इस बात की है कि कौन अपने वरिष्ठ की सबसे सटीक नकल कर सकता है। मंच पर पहुंचते ही प्रशस्ति गान शुरू हो जाता है। भाषण की शुरुआत आका जी से, बीच में आका जी और अंत में भी आका जी। अगर समय बच जाए तो जनता का जिक्र भी कर लिया जाता है। कई बार तो लगता है कि कार्यक्रम किसी विकास योजना का नहीं, बल्कि “राष्ट्रीय प्रशंसा महोत्सव” का आयोजन है। तारीफों की इस दौड़ में भी जबरदस्त प्रतिस्पर्धा है। एक नेता कहता है, “हमारे नेता युगपुरुष हैं।” दूसरा तुरंत उससे आगे निकलते हुए उन्हें “महायुगपुरुष” घोषित कर देता है। तीसरा पीछे क्यों रहे, वह उन्हें “धरती पर अवतरित विकास पुरुष” या फिर कलयुग के भगवान बता देता है। फिर बाकी लोग सोच में पड़ जाते हैं कि अब अगली उपाधि क्या बची है!

राजनीति में विचारधारा, संगठन और जनसेवा की बातें अब पुराने जमाने की चीजें लगने लगी हैं। आज का फॉर्मूला सीधा है,जितनी ऊंची प्रशंसा, उतनी मजबूत संभावना। जनता सोचती रहती है कि सड़क कब बनेगी, पानी कब आएगा और रोजगार कब मिलेगा, जबकि नेता यह तय करने में व्यस्त हैं कि अगली सभा में अपने वरिष्ठ की तारीफ किस नए विशेषण से की जाए। पहाड़ की पुरानी कहावत आज भी सही साबित हो रही है। फर्क बस इतना है कि अब “ठुल बाग में करतार” बनने के लिए खेत नहीं, बल्कि प्रशंसा के पौधे सींचने पड़ते हैं।

























