जन अभिव्यक्ति विशेष
पहाड़ों की गोद में बसी उत्तराखंड की मिट्टी कभी शौर्य, त्याग और सत्यनिष्ठा की गाथा गाती थी। कभी यहाँ चारणभाट राजाओं के पराक्रम को स्वर देते थे, लोक को धर्म का स्मरण कराते थे। उनकी वाणी में चापलूसी नहीं, चरित्र था। उनकी लेखनी में लोभ नहीं, लोकहित था। आज वही परंपरा एक विकृत रूप में जीवित है। अंतर केवल इतना है कि ढोल-मंजीरे की जगह अब सोशल मीडिया की तालियाँ हैं, और प्रशस्ति गान की जगह स्वार्थ की स्तुति है।
यह समाज के वे “श्वेतवसन” हैं जो धन को ही धर्म और दौलत को ही देवता मान बैठे हैं। कुछ मूल निवासी, कुछ बाहर से आकर बसे हुए। कुछ ने संघर्ष से पराजय स्वीकार कर यह मार्ग चुना, कुछ ने इसी मार्ग को सीढ़ी बनाकर तथाकथित तरक्की का स्वप्न देखा। उनके लिए सिद्धांत एक बोझ है, और ईमानदारी एक पुरातन अवधारणा।
इनकी सबसे बड़ी पूँजी चमचागिरी है। अवसर देखकर झुकना, स्वर बदलकर गाना और आवश्यकता अनुसार रंग बदलना — यही इनका कौशल है। सार्वजनिक मंचों पर ये सम्मान और सौहार्द के मुखौटे पहनते हैं। भीड़ छँटते ही इनके चरित्र की परतें उतर जाती हैं। सौ में से निन्यानवे लोग इनकी निंदा करते हैं, फिर भी ये उसी निंदा को अमृत समझकर पी जाते हैं। क्योंकि अब इनके लिए मर्यादा का कोई मोल नहीं। मोल है तो केवल पहुँच का, प्रभाव का, और उस तंत्र का जो ऊपर से नीचे तक जाल की भाँति फैल चुका है।
सोशल मीडिया पर इनके विरुद्ध आक्रोश की बाढ़ आती है। टिप्पणियाँ कटाक्ष बनती हैं, पोस्ट प्रतिरोध बनते हैं। परन्तु सूर्यास्त होते-होते वही आलोचक इन्हीं की चौखट पर हाज़िरी लगाने पहुँच जाते हैं। क्योंकि “काम करवाना” है। और यह वर्ग काम करवाने की कला में पारंगत है। किसे क्या चाहिए, किसकी कमजोरी क्या है, किसे कैसे साधना है — यह गणित इन्हें कंठस्थ है। सत्य को भी ये तथ्यों के जाल में उलझाकर मौन करा देते हैं।
यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जिस देवभूमि को ऋषियों की तपोभूमि कहा जाता है, उसी की गलियों में अब नैतिकता नीलाम हो रही है। जहाँ कभी “अतिथि देवो भव” का उद्घोष था, वहाँ अब “हितैषी हिताय भव” का सिद्धांत चल रहा है।
जब नायक ही दिशाहीन हो जाए तो अनुयायी से दिशा की अपेक्षा व्यर्थ है। जब व्यवस्था के शीर्ष पर ही अवसरवाद का मुकुट हो तो आधार में ईमानदारी कैसे पनपेगी? गंदगी तब तक नहीं धुलेगी जब तक कोई साहस करके झाड़ू हाथ में न ले।
चारणभाट की गाथा अब हमें स्मरण कराती है कि शब्दों का दुरुपयोग कितना घातक होता है। प्रशंसा यदि विवेक खो दे तो वह विष बन जाती है। और स्तुति यदि स्वार्थ से सनी हो तो वह समाज का क्षय कर देती है।
उत्तराखंड को बचाना है तो हमें फिर से उन मूल्यों की ओर लौटना होगा जहाँ इज्जत, इंसानियत और ईमान का मूल्य धन से अधिक था। जहाँ व्यक्ति की पहचान उसके पद से नहीं, उसके चरित्र से होती थी।
वरना इतिहास हमें भी उसी श्रेणी में रख देगा — उन नवचारणों में, जिन्होंने ताली के बदले तमगा तो पा लिया, पर आत्मा गिरवी रख दी।






























