Home उत्तराखंड काम या प्रदर्शन? रील्स के दौर में बदलती अफसरशाही

काम या प्रदर्शन? रील्स के दौर में बदलती अफसरशाही

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ये खबर किसी एक अधिकारी की न होकर उस बदलते प्रशासन की है, जो अब फाइलों से निकलकर फीड में आ गया है। जहां कभी आदेश दफ्तर की दीवारों पर टंगे होते थे अब वो इंस्टाग्राम की स्टोरी बन रहे हैं। जहां कभी काम की रिपोर्ट फाइलों में दर्ज होती थी अब वो रील्स में एडिट होकर जनता तक पहुंच रही है।
यहां सवाल ये है कि क्या प्रशासन अब दिखने लगा है या दिखाया जाने लगा है? प्रशासनिक अमला यानी आई.ए.एस.,आई.पी.एस.और सरकारी कर्मचारी सोशल मीडिया पर पहले से कहीं ज्यादा सक्रिय हो गए हैं। पहली नजर में ये बदलाव सकारात्मक लगता है। अधिकारी सीधे जनता से संवाद कर रहे हैं, शिकायतों का समाधान तेज हो रहा है, और योजनाओं की जानकारी तुरंत मिल रही है। पारदर्शिता बढ़ती दिख रही है। लेकिन इसी पारदर्शिता के पीछे एक परत और है चिंता की। सरकारी सेवा का मूल सिद्धांत है तटस्थता। अधिकारी किसी भी राजनीतिक विचार या दल से दूरी बनाए रखते हैं, ताकि उनका काम निष्पक्ष दिखे, लेकिन जब वही अधिकारी सोशल मीडिया पर किसी नीति, मुद्दे या विचार पर खुलकर राय रखते हैं, तो एक सामान्य नागरिक के मन में सवाल उठता है क्या ये निजी राय है या सरकारी रुख? समस्या तब और गहरी हो जाती है जब कोई पोस्ट वायरल हो जाती है। एक ट्वीट या रील लाखों लोगों तक पहुंचती है और लोग उसे प्रशासन की आधिकारिक सोच मान लेते हैं। अधिकारियों द्वारा योजनाओं और कार्रवाई की जानकारी साझा करना पारदर्शिता बढ़ाता है, लेकिन कई बार अधूरी या संवेदनशील जानकारी भी बाहर आ जाती है। इससे अफवाह फैलती है, भ्रम पैदा होता है, और लोगों को ये डर भी रहता है कि कहीं व्यक्तिगत डेटा या जांच से जुड़ी बातें लीक न हो जाएं।

सोशल मीडिया ने एक नई सुविधा दी है सीधा संवाद। लेकिन यही सुविधा अब व्यवस्था पर सवाल भी खड़े कर रही है। जब आदेश और स्पष्टीकरण का मुख्य स्रोत ट्वीट या पोस्ट बन जाए, तो दफ्तर की प्रक्रिया कमजोर पड़ती है। लोग पूछने लगे हैं क्या अब फाइलों से ज्यादा भरोसा रील्स पर करना होगा? सरकारों ने गाइडलाइंस बनाई हैं क्या पोस्ट करना है, क्या नहीं। लेकिन इन नियमों का पालन हर जगह एक जैसा नहीं है। यही असमानता भरोसे को कमजोर करती है। अब बात सिर्फ संवाद की नहीं रही बात छवि की भी है। सोशल मीडिया ने अधिकारियों को एक नई ताकत दी है व्यक्तिगत लोकप्रियता की ताकत।
एक वायरल पोस्ट, लाखों फॉलोअर्स, और “जनता का अधिकारी” की छवि ये सब करियर पर असर डालने लगे हैं।लेकिन यहां एक खतरा भी है। जब फोकस जमीन पर काम करने से हटकर कैमरे के सामने काम दिखाने पर आ जाए,
जब समस्या हल करने से ज्यादा उसे प्रस्तुत करने पर ध्यान हो
तो प्रशासन “सेवा” से “प्रदर्शन” में बदलने लगता है। इसे लोग “सेल्फ-प्रोजेक्शन” कहते हैं जहां समाधान कम, उसका प्रचार ज्यादा होता है। इसका असर सिर्फ बाहर नहीं, सिस्टम के अंदर भी दिखता है। हर अधिकारी के पास समान संसाधन या फॉलोअर बेस नहीं होता। जो सोशल मीडिया पर लोकप्रिय है, उसकी आवाज ज्यादा सुनी जाती है। बाकी अधिकारियों का काम, भले ही मजबूत हो, पीछे छूट जाता है। धीरे-धीरे एक नई असमानता पैदा होती है काम की नहीं, दिखने की। और फिर सवाल उठता है क्या अधिकारी सेवा कर रहे हैं या खुद का ब्रांड बना रहे हैं?
उत्तराखंड जैसे राज्यों में ये बहस और गहरी हो जाती है। जहां सड़क, स्वास्थ्य, पानी और पलायन जैसी समस्याएं वर्षों से हैं…
वहां अगर प्रशासनिक फीड में सांस्कृतिक कार्यक्रम, ट्रेकिंग या रील्स ज्यादा दिखें, तो लोगों को लगता है कि प्राथमिकताएं बदल रही हैं। सांस्कृतिक जुड़ाव गलत नहीं है लेकिन अगर अस्पताल में डॉक्टर नहीं है, स्कूल में शिक्षक नहीं है और सोशल मीडिया पर सब “ठीक” दिख रहा है, तो भरोसा टूटता है। सोशल मीडिया का सबसे बड़ा खतरा ये नहीं है कि अधिकारी वहां हैं बल्कि ये है कि कहीं वही मुख्य मंच न बन जाए। जब काम से ज्यादा उसकी पोस्ट महत्वपूर्ण हो जाए। जब फीडबैक जमीन से नहीं, कमेंट सेक्शन से आने लगे। जब नीति जरूरत से नहीं, एल्गोरिदम से बनने लगे, तब प्रशासन का संतुलन बिगड़ता है। लेकिन तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक भी नहीं है। सोशल मीडिया सही तरीके से इस्तेमाल हो तो ये एक मजबूत डैशबोर्ड बन सकता है। जहां समस्या दिखे, समाधान की प्रगति दिखे, और जिम्मेदारी तय हो। जहां अधिकारी खुद स्टार न बने काम स्टार बने।